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Shri Jagdish Lal Sahib Ji

श्री जगदीश लाल साहिब जी

जगत हितैषी सतगुरु, मोरा हित तव हाथ ।
     मो पे करो दयालुता, सर्व जगत के नाथ ।।

जगत हितैषी सतगुरु, मोरा हित तव हाथ ।
     मो पे करो दयालुता, सर्व जगत के नाथ ।।

Shri Jagdish Lal Sahib Ji

श्री जगदीश लाल साहिब जी

Satgurudev Shri Jagdish Lal Sahib Ji was the Eighth Gurudev of the resplendent Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His kindness was instrumental in removing the sufferings of his devotees.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के अष्टम गुरुदेव के रुप में सतगुरु देव श्री जगदीश लाल साहिब जी भक्तों के हित के लिए अवतार ले कर आए और कल्प वृक्ष के समान, उनके सानिध्य में जो भी आता वह मनवांछित फल पाता। जब वे ग्यारह वर्ष के हुए तो अपनी माता तखत बाई जी के साथ सेवकों के पास गए। भिन्न-भिन्न स्थानों से होते हुए वे बुच्चा गांव आ गए। गांववासी श्री सतगुरु देव जी तथा माता जी के दर्शन पाकर प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम कर आदर सहित घर ले आए।

At the age of eleven, he went with his mother Takht Bai Ji to meet his followers. After visiting different places, they went to Buchcha village. The villagers were pleased to see them. They bowed in reverence and brought them home with utmost respect. Next morning when Mata Ji called all the followers, some of them did not come. She came to know that there was another guru who had influenced the followers. She got angry and ordered to summon ‘that’ guru immediately. He was brought there at once. She asked why he had misled the followers. The guru replied arrogantly that everyone was aware of his powers so they accepted him as their satguru. Mata Ji asked him to prove his proclaims.

अगले दिन प्रातः जब माता जी ने सभी सेवकों को बुलाया तो कुछ सेवक नहीं आए। माता जी के पूछने पर एक सेवक ने बताया कि आप बहुत समय बाद आए हो इसलिए एक अन्य गुरु ने मायावी छल कपट से आपके सेवकों को बहला फुसला लिया है। श्री सतुगरु देव जी ने उतेजित हो कर कहा ऐसा कोई नहीं जो श्री हरमिलाप पावन गद्दी के सेवकों को विचलित कर सके, यह सुनकर उसी समय कुछ सेवक तुरंत उस गुरु को बुला लाए। माता जी ने उससे पूछा – हमारे सेवकों के समूह को तुमने क्यों भ्रमित किया है। इस पर वह गुरु अभिमान पूर्वक बोला – हमारे चमत्कार को सब जानते हैं इसीलिए ही मुझे अपना गुरु मानते हैं। तब माता जी ने कहा – अगर तुम में कोई शक्ति है तो दिखाओ।

A huge stone weighing around 60 ser (approximately 48 kilos) was lying there. Pointing towards the stone, Mata Ji said, “All the people will follow the one on whose feet this stone shall fall.” The guru chanted various mantras and used his powers but the stone did not even stir. Praying to Shri Harmilap Sahib Ji, Mata Ji commanded the stone to move. The moment she had uttered these words, the stone dragged itself ahead three times and fell at her feet. On seeing this miracle, everyone present there fell at Mata Ji’s feet and said that they were her devotees only. The guru got scared and embarrassed. He apologized to Mata Ji and went away.

माता जी ने वहां पर पडे एक बहुत भारी पत्थर की ओर संकेत करके कहा,बिना हाथ लगाए यह पत्थर जिसके चरणों में आकर गिरे, सभी सेवक उसी के होंगे। उस गुरु ने विभिन्न मंत्रों का उच्चारण कर अपनी सारी ताकत लगा दी परंतु वह पत्थर बिलकुल भी न हिला। फिर वह गुरु बोला यह तो जड़ वस्तु है, इसे हाथ लगाए बिना कौन चला सकता है। तब माता जी ने दोनों हाथ जोड़ अत्यंत सुंदर वाणी से श्री हरमिलाप साहिब जी का सुमिरन कर उनसे प्रार्थना की और इसके साथ ही वह पत्थर तीन बार आगे को सरक कर उनके चरणों में आ गिरा। यह लीला देखकर , वहां पर उपस्थित सभी लोग / सेवक माता जी के चरणों में नमन कर कहने लगे कि हम तो श्री हरमिलाप पावन गद्दी के ही सेवक हैं। कृपा करके हमें क्षमा करें, हम भ्रमित हो गए थे और यह देखकर वह गुरु डर गया एवं लज्जित होकर माता जी से क्षमा याचना कर वहां से चला गया। माता जी जितने दिन तक बुच्चा में रहीं, वे नित्यप्रति सतसंग करती व सेवकों को उपदेश देते हुए कहतीं – जो सतगुरु को ईश्वर के समान माने, श्वास-श्वास में गुरुमंत्र का जाप करे, अपने स्वभाव को बहुत ही नम्र रखे, गुरु जो भी वचन कहें उनको सत्य माने, जिसके हृदय में यह गुण हों, वह सतगुरु का भक्त कहलाता है। अपने कर्म और व्यवहार शुद्ध रखने से भक्ति का रंग स्वयं ही चढ़ जाता है।

Mata Ji stayed at Buchcha for a few days. She used to preach the followers. She explained to them the characteristics of an ideal devotee as the one who believes in Satguru as God, chants guru mantra with every breath, holds humble temperament and accepts what the Guru says as the truth. Sincere deeds and an honest conscience can find no match in anything else.

सुख देने वाले श्री सतगुरु देव जी अपने मित्रों के साथ हर रोज खेलने जाते। एक दिन सभी बालकों ने लकड़ी का एक गड्डा मंगा लिया और बारी-बारी से उस पर एक बालक को बीच में बिठा कर झूला देते एवं प्रसन्न होते। जब श्री सतगुरु देव जी की बारी आई तो बालक उन्हें गड्डे में बिठाकर यह कहते हुए भाग गए कि इन्होंने उनकी बारी में गड्डे को ठीक प्रकार से नहीं धकेला। यह सुनते ही बालरूप श्री सतगुरु देव जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने गड्डे को कहा-हे मेरे गड्डे! तूं भाग और सबसे पहले जा पहुंच। गड्डा आश्चर्यजनक रूप से उड़न-खटोले की तरह डेरे पर आ पहुंचा। सभी बालक अपने मित्र की इस लीला को देख दंग रह गए और फिर बालरूप श्री जगदीश लाल साहिब जी द्वारा अपनी दिव्य शक्ति से गड्डा दौड़ाने वाली बात सबको बता दी। यह सुनकर सभी नगरवासी सतगुरु देव श्री जगदीश लाल साहिब जी के दरबार दर्शनो के लिए इकट्ठे हो गए।

One day Shri Satgurudev Ji went to play with his friends. They took a wooden cart and started riding it taking turns one after another. When it was Gurudev’s turn, all the children ran away saying he had not pushed the cart properly during their turn and that he was proud of himself being a Guru. Hearing this, Gurudev got angry and commanded the cart to run. Amazingly, the cart started swaying like a flying hammock and reached the Dera. When Mata Ji came to know of this, she asked what had caused him to use his divine power all of a sudden. Angry at this incident, she slapped him. Shedding tears, Gurudev said that she had hit him without a reason, so she would also feel pain just the way he did. The moment he said that, Mata Ji felt intense pain in her stomach. People present there called a doctor. He gave her medicine but the pain kept getting even more severe. Devotees went to Gurudev and lovingly told that Mata Ji was in distress. They prayed to him and asked for a cure for her pain. Gurudev told them to give her two seeds of black pepper. They immediately did as Gurudev said. As soon as Mata Ji had those two seeds of black pepper, her pain vanished.

जब माता जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने पुत्र से पूछा कि ऐसी कौन सी मुसीबत आ गई थी जो तुम्हें अपनी दिव्य शक्ति का अचानक ही प्रयोग करना पड़ा। माता जी इस घटना से बहुत गुस्सा हुईं और उन्होंने पुत्र को एक चपत लगा दी। बालरूप श्री जगदीश लाल साहिब जी ने रोते हुए, सहज भाव से माता जी से कहा कि - आप बिना दोष के मुझे मार रही हो अतः जिस प्रकार मुझे पीड़ा हुई है, आपको भी वैसी ही हो। उनके मुख से ऐसा निकलते ही माता जी को पेट में भयानक पीड़ा होने लगी। सेवक वैद्य को बुला लाए, उसने औषधि तो दी परंतु माता जी की पीड़ा बढ़ती ही गई। तब सेवक श्री सतगुरु देव जी के पास गए और उनसे प्रेमपूर्वक विनती की कि -हे दीन दयालु! कृपा कीजिए माता जी बहुत दुःख पा रही हैं। उन्होंने श्री सतगुरु देव जी से प्रार्थना की और पूछा कि उन्हें कौन सी औषधि पिलाएं। श्री सतगुरु देव जी ने कहा - उन्हें दो काली मिर्चें खिला दो। सेवक जाकर दो काली मिर्चें ले आए और माता जी को खिला दी। काली मिर्च खाते ही माता जी की सारी पीड़ा एकदम दूर हो गई।

After staying at Buchcha, Mata Ji and Gurudev went to Chanyot. Followers started rejoicing on seeing them. They arranged their stay at ‘Shri Harmilap Thakur Dwara’. While going upstairs, Gurudev started plucking leaves and buds from the vine of the kashiphal, crushing and throwing them away playfully. The caretaker of the Thakur Dwara complained to Mata Ji. She said that she could not restrain him. Gurudev told them that he was not extracting, instead he was planting fruits on the vine. Surprisingly, fruits appeared on the vine. People were amazed to see this miracle. They believed that the child was actually a deity in human form. Mata Ji got perturbed and returned home. She was worried for the disclosure of divine powers was not justified in their family. However, Shri Jagdish Lal Ji was freely giving away all the secrets of his power.

बुच्चा गांव में कुछ समय तक रहने के बाद माता जी और श्री सतगुरु देव जी चनयोट आ गए। श्री सतगुरु देव जी के दर्शन पाकर सेवक बहुत प्रसन्न हुए। माता जी और श्री सतगुरु देव जी अपने स्थान ‘श्री हरमिलाप ठाकुर द्वारा’ में ठहरे और एक दिन वहां की सीढ़ियां चढ़ते समय श्री सतगुरु देव जी चंचलतापूर्वक काशीफल की बेल को तोड़कर मसल-मसल कर फेंकने लगे। यह देख कर वहां के रखवाले ने माता जी से शिकायत की कि आप अपने बालक को रोकती क्यों नहीं।माता जी ने उससे कहा कि उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं के गुरूदेव को रोक सकें। श्री सतगुरु देव जी ने उनसे कहा कि -माता जी! हम तोड़ नहीं रहे, हम तो इसमें फल लगा रहे हैं और तभी बेल पर फल दिखाई देने लगे। यह लीला देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गए और उन्हें विश्वास हो गया कि यह बालक मनुष्य के रूप में अवतार है। पुत्र की नित्य नई लीलाएं देखकर माता जी मन ही मन व्याकुल हो गईं और घर वापस आ गईं। वे दिन-रात चिंतित रहतीं कि हमारे कुल में दिव्य शक्तियों के प्रदर्शन को अनीति मानने की रीति रही है परंतु श्री जगदीश लाल साहिब जी ने अपनी शक्तियों को प्रकट कर दिया है।

Over the years, Satgurudev Shri Jagdish Lal Sahib Ji used to preach his followers and fulfill their wishes. At the age of twelve, one day he told Mata Ji that he was being called by Shri Harmilap Sahib Ji. Mata Ji felt as if lightning had struck her. Gurudev then told her about his previous birth. He said that his name was Raja Ram and he was the son of Shri Kunjbhawan Sahib Ji Maharaj. He had befriended Guru Narsinh Ji. They knew everything about each other in their heart and had even decided to go to Param Dham together. When they gave up their lives, twelve years of his age had still remained which he had spent with her in this life. His life span had now been completed. On hearing this, Mata Ji was traumatized as her only hope in life was her son. Gurudev bowed at her feet. Reciting the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji, he gave up his vital breath through Brahmdwar and went to indwell at Satyaloka. Mata Ji felt deep sorrow. She was upset that there was no one to uphold the Guru Gaddi. Eventually, she did not take the charge of the Gaddi herself but came forward to render her services.

इस प्रकार सुखकारी समय बीतता रहा। सतगुरु देव श्री जगदीश लाल साहिब जी सेवकों को उपदेश दिया करते एवं उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते। जब वे बारह वर्ष के हो गए तो उन्होंने एक दिन माता जी से कहा कि - श्री हरमिलाप साहिब जी मुझे बुला रहे हैं। यह सुनकर माता जी को ऐसा लगा जैसे उन पर बिजली गिरी हो। फिर श्री सतगुरु देव जी ने उन्हें अपने पिछले जन्म के बारे में बताया कि - “उस जन्म में मेरा नाम राजा राम था और श्री कुन्जबिहारी साहिब जी महाराज मेरे पिता थे। मेरी गुरु नरसिंह जी के साथ मित्रता हो गई। हम दोनों में कोई अंतर्भेद न रहा और हमने यह निश्चित किया कि जब परमधाम जाएंगे तो एक साथ ही जाएंगे। अतः जब हम दोनों ने प्राणों का विसर्जन किया, उस समय मेरी बारह वर्ष की आयु शेष रहती थी। वह बारह वर्ष मैं आपके साथ रहा हूं और इस तरह अब मेरा जीवन पूर्ण हो गया है।” माता जी को यह सुनकर गहरा आघात लगा। श्री जगदीश लाल साहिब जी ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा थे। श्री सतगुरु देव जी ने माता जी के चरणों में प्रणाम किया और श्री हरमिलाप साहिब जी के नाम का सुमिरन करते हुए ब्रह्मद्वार से प्राणों का विसर्जन कर सत्यलोक को गमन किया। माता जी को बहुत गहरा दुःख लगा ,,,और वे अपने को सेविका समझते हुए गद्दी के कार्य चलाने लगीं।

There was another devotee named Jassa Ram who had six sons. His ancestors had promised to give half of the calves born to their cows to the Guru Darbar. Once when all the cows gave birth to calves, a selfish desire overcame his sons’ mind and they broke the promise their ancestors had once made. They kept the healthy calves for themselves and separated the weaker ones by tying a thread around their neck for offering to Guru Darbar. Next morning, a weird incident happened. They found the calves they had kept for themselves dead and the ones, who were tied with a thread, were jumping. Thus, deceiving Guru Darbar out of greed led to their downfall.

वहां पर जस्सा राम नाम का एक अन्य सेवक रहता था जिसके छह पुत्र थे। श्री हरामिलाप पावन गद्दी के तृतीय गुरुदेव श्री राजा राम साहिब जी ने उनके पूर्वजों की डाकुओं से रक्षा की थी, तत्पश्चात उसके पूर्वजों ने प्रण किया था कि भविष्य में अपनी गुऊओं के जन्मे सभी बछड़े श्री सतगुरु देव जी के दरबार में भेंट कर देंगें। एक बार जब सब गायों ने बछड़े दिए तो जस्सा राम के पुत्रों के मन में लालच आ गया और उन्होंने मन में कपट भर माता जी से विनती की कि आप यह बछडे इस बार हमें दे दो,चाहो तो कुछ बछडे आप अपने लिए रख लो। तब माता जी ने कहा-जो आपने रखने हैं रख लो, जो गुरू दरबार के हें उनके गले में धागा बांध दो. माता जी से बछडे बख्शवा कर भी मन का कपट कम न हुआ और जो-जो बछड़े अच्छे थे उनको अपने लिए रखकर बाकी बचे कमजोर बछड़ों के गले में धागा बांधकर गुरु दरबार में देने के लिए अलग कर दिया। अगले दिन प्रातः उठकर उन्होने देखा कि जिन बछड़ों को उन्होंने अपने लिए रखा था, वे सब मृत पाए गए और जिन बछड़ों को धागा बांधकर गुरु दरबार में देने के लिए अलग किया था, वे सब उछल-कूद कर रहे थे। गुरु दरबार से छल करने का प्रतिफल उन्हें यह मिला कि वे दिन-प्रतिदिन दरिद्र होते गए।

Mata Ji was always worried as to who would take charge of the sacred Guru Gaddi. One night while she fell asleep moaning, Shri Satgurudev Ji appeared in her dream and said, “Go to Jhang city, where lives a devotee named Dasu Ram. He had promised to offer one of his sons to Guru Darbar and it was time to fulfill his promise. You will choose the one who shall cross the fire and sit in your lap. Consider the one who succeeds in this test as the Brahm and assign the Guru Gaddi to him.”

माता जी हमेशा सोच में डूबी रहतीं कि श्री सतगुरु देव जी की अत्यंत पावन गद्दी को कौन चला सकता है। एक दिन वे श्री हरमिलाप साहिब जी से प्रार्थना करते हुए विलाप करते-करते ही सो गईं। सतगुरु देव श्री हरमिलाप साहिब जी ने उनके स्वप्न में आकर कहा कि, “झंग शहर में दासू राम नाम का एक सेवक रहता है, जिसने गुरु दरबार में एक पुत्र अर्पण करने का वचन किया हुआ है। उसको जाकर कहना कि वचन पूरा करने का समय आ गया है। तुम उसका वह पुत्र लेना जो अग्नि को पार कर तुम्हारी गोद में आकर सुशोभित हो। जो इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो उसे ब्रह्म के समान समझना और गुरुगद्दी पर विराजमान करना।”

Next morning, Mata Ji went to Jhang. Dasu Ram was pleased to see her. She narrated her dream to him. Dasu Ram called all his four sons. Mata Ji took the fire test. Among the four children, the child named Rampyara, who was gifted and precocious, crossed the fire and sat in her lap. Her heart got filled with immense love. She liked the uniqueness of this child and felt inherently as if Shri Jagdish Lal Sahib Ji had incarnated as Shri Rampyara Ji. She took him along with her and returned home.

अगले दिन प्रातः माता जी झंग शहर गईं। उनके दर्शन पाकर दासू राम बहुत प्रसन्न हुआ। माता जी ने सारा स्वप्न उसे सुनाया। दासू राम ने अपने चारों पुत्रों को बुला लिया। माता जी ने कहा हमारा तो वह ही होगा जो इस अग्नि को पार करके हमारे पास आएगा। उन चारों बालकों में से रामप्यारा नाम का बालक, जो प्रतिभाशाली और गुणों का भंडार था, वह आग में से निकल कर आया और माता जी की गोद में विराजमान हो गया। माता जी के हृदय में अपार प्रेम उमड़ आया। उनको वह अनुपम बालक भा गया और उन्हें ऐसे लगा जैसे श्री जगदीश लाल जी ही श्री रामप्यारा जी का रूप लेकर आ गए हों। माता जी उन्हें साथ लेकर घर वापस आ गईं। घर आ कर उन्हें जप, तप, व्रत का पालन करवाते हुए गुरुनीति समझाई एवं पूर्वजों की पवित्र गाथा विस्तार से कहकर उनको ‘सोहम्’ जाप दिया। फिर एक शुभ दिन माता जी ने श्री रामप्यारा जी को विधिवत तिलक लगाकर उन्हें पावन गुरुगद्दी पर विराजमान किया। कुछ समय पश्चात उनका विवाह संपन्न कर दिया। आनंदमय समय बीत रहा था। एक दिन माता जी ने आसन लगा लिया और श्री हरमिलाप साहिब जी के नाम का सुमिरन करते हुए अपने प्राणों का त्याग कर परम गति प्राप्त कर ली।

On one auspicious day, Mata Ji did the tilak of Shri Rampyara Ji and ceded him the Guru Gaddi. She taught him to chant, meditate and follow fasting and abstinence, and then imparted the knowledge of Guruneeti. She narrated to him the sacred saga of the ancestors and gave the Soham jaap. Then after some time, she got him married too.

जो व्यक्ति सतगुरु देव श्री जगदीश लाल साहिब जी की गाथा को श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ता है वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है तथा उसके हृदय में गुरुभक्ति आ जाती है।

Time was moving on. One day, Mata Ji took asana, reciting the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji, gave up her breath and took salvation.

The one, who reads with belief the saga of Satgurudev Shri Jagdish Lal Sahib Ji, becomes free from all the earthly bonds and his heart is filled with spirituality and devotion.