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Shri Chaman Lal Sahib Ji

श्री चमन लाल साहिब जी

श्री चमन लाल जी अति सुखमूला ।
    नाम अनल जारे अघ तूला ।।
जेहिं सुमिरत होवे कल्याना । गुरु पद कमल सुमंगल खाना ।।

श्री चमन लाल जी अति सुखमूला ।
    नाम अनल जारे अघ तूला ।।
जेहिं सुमिरत होवे कल्याना । गुरु पद कमल सुमंगल खाना ।।

Shri Chaman Lal Sahib Ji

श्री चमन लाल साहिब जी

Satgurudev Shri Chaman Lal Sahib Ji was the Seventh Gurudev of the glorious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His aura was as bright as the sun. He loved his devotees and freed them from their sufferings. He was always surrounded by his followers, at his Darbar.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर सप्तम गुरुदेव के रूप में विराजमान सतगुरु देव श्री चमन लाल साहिब जी के मुखमंडल पर सूर्य के समान तेज सुहाता। वे अपने सेवकों से अत्यधिक प्रेम करते और उनके कष्टों का निवारण करते। उनके दरबार में सदा ही सेवको की भीड़ लगी रहती।

Once, a devotee from Jhang city, named Dasu Ram, came to Shri Satgurudev Ji. He paid obeisance and gave him offerings. Then he fell at Shri Satgurudev Ji’s feet and described his sorrow. He was a childless man. He had come to him with great hope. Gurudev told him to chant the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji in every moment. He would have four sons and his suffering would end, thus. On hearing this, Dasu Ram felt content. He bowed at Shri Satgurudev Ji’s feet again and again and promised that if he had four sons, he would offer one of them in the service of Guru Darbar. After being blessed by Gurudev, he went back gladly.

एक बार झंग शहर से एक सेवक जयसिंह, जिसे षष्टम सतगुरु देव श्री चन्द्रभान साहिब जी ने यह वरदान दिया था कि उसे श्री हरमिलाप साहिब जी का नाम सबसे प्यारा लगेगा और उसके वंशज श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर विराजमान होंगे, का पुत्र दासू राम, सतगरू देव श्री चमन लाल साहिब जी के पास आया। उसने आकर श्री सतगुरु देव जी के दर्शन किए और उन्हें भेंट अर्पण की, फिर उनके चरणों में नमन कर अपने दुःख का वर्णन करते हुए बोला – हे गुरुदेव! मेरी कोई संतान नहीं है, मैं बहुत आशा लेकर आपके पास आया हूं। श्री सतगुरु देव जी ने कहा – तुम हर पल केवल श्री हरमिलाप साहिब जी के नाम का जाप करना, उनकी कृपा से तुम्हारे घर चार पुत्र होंगे और तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा। यह सुनकर दासू राम ने बहुत सुख का अनुभव किया। उसने बार-बार श्री सतगुरु देव जी के चरणों में सिर झुकाया और कहा कि – मेरे घर जो चार पुत्र होंगे उन में से एक पुत्र गुरु दरबार की सेवा में अर्पण कर दूंगा। उसके बाद श्री सतगुरु देव जी से आशीर्वाद पाकर वह चला गया।

As time passed, Satgurudev Shri Chaman Lal Sahib Ji was blessed with a son. The child was named ‘Jagdish Lal’, who was naughty but precocious and impressive. One day Shri Satgurudev Ji told his wife never to get angry at this child. It seemed to him as if he was the incarnation of God. Gurudev asked her not to disclose it to anyone else.

इसी प्रकार श्री सतगुरु देव जी के दरबार पर सेवक आते रहते और मनवांछित फल प्राप्त करते। कुछ समय पश्चात श्री सतगुरु देव जी के घर एक सुपुत्र का जन्म हुआ। बालक का नाम ‘जगदीश लाल’ रखा गया। बालक जगदीश लाल जी बहुत नटखट, चुलबुले और तेजवान थे। एक दिन श्री सतगुरु देव जी ने अपनी पत्नी से कहा कि – इस बालक से कभी गुस्सा न होना क्योंकि मुझे तो यह सच्चिदानंद स्वरूप ही लगता है।

Followers used to come to Shri Satgurudev Ji. Once a devotee from village Buchcha, named Ruldu Ram, came for the darshan of Shri Satgurudev Ji. On the way, his horse fell ill. He bowed at Gurudev's feet and told him about his misery that his horse would not survive. His life was totally dependent on that horse. He prayed to Gurudev to have mercy on him and cure the animal. Gurudev went to the spot where the horse lay unconscious. He touched the horse lovingly and asked it to wake up and serve its master. Surprisingly, the horse regained consciousness and sat up at once as if it had never been ill.

एक बार बुच्चा गांव से रुलदू राम नामक सेवक श्री सतगुरु देव जी के दर्शन करने आया। वहां पर उसका घोड़ा बीमार हो गया। उसने श्री सतगुरु देव जी के चरण पकड़ लिए और प्रार्थना की – हे गुरुदेव, मेरा घोड़ा बहुत बीमार हो गया है, अब जीवित नहीं बच पाएगा। मेरी जीविका तो इसी पर ही निर्भर है। मुझ पर कृपा करो और घोड़े को बचा लो। श्री सतगुरु देव जी वहां गए जहां घोड़ा बेसुध गिरा पड़ा था। उन्होंने उसे अपने करकमलों से स्पर्श किया और कहा – उठो, अपने मालिक की सेवा करो। इतना सुनते ही घोड़े को होश आ गया और वह ऐसे उठ बैठा मानो उसे कोई रोग ही न लगा हो।

The glory of Shri Satgurudev Ji spread around. Some time passed, one day Shri Satgurudev Ji called his son Shri Jagdish Lal Ji and gave him the knowledge of Guruneeti and ceded him the Guru Gaddi. Full of religion allegiance and perseverance, Shri Satgurudev Ji followed the path described in Vedas. Though his body had become weak, the sheen on his visage increased like that of the sun. Always reciting ‘Naam’, Shri Satgurudev Ji himself took the form of the Brahm.

इस प्रकार मंगलमय समय बीतता गया। एक दिन श्री सतगुरू देव जी ने अपने पुत्र श्री जगदीश लाल जी को बुलाया और उन्हें गुरुनीति का ज्ञान देकर पावन गुरुगद्दी का तिलक लगाया। धर्म श्रेष्ठ तथा अत्यंत धैर्यवान श्री सतगुरु देव जी सभी कार्य वेदों के अनुसार करते और व्रतों का पालन करते। उनके मुख की कांति सूर्य के समान हो गई। ‘नाम’ का सुमिरन करते-करते वे स्वयं ब्रह्म के ही स्वरूप बन गए।

At the age of forty, one day he called his wife and son and told them that he was being called by Shri Harmilap Sahib Ji. He did not like anything anymore and wanted to go to Param Dham. On hearing this, both Shri Jagdish Lal Ji and Mata Ji were shocked and became speechless. Shri Satgurudev Ji took samadhi and gave up his life through Brahmdwar. There was anguish all around.

उनकी आयु अभी चालीस वर्ष ही थी, एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्र को बुलाया और कहा कि – हमें श्री हरमिलाप साहिब जी का बुलावा आया है इसलिए अब कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा, हम परमधाम जाना चाहते हैं। यह सुनते ही श्री जगदीश लाल साहिब जी और माता जी दोनों स्तब्ध रह गए। उनके मुख से कोई शब्द न निकला। श्री सतगुरु देव जी ने समाधि लगा ली और ब्रह्मद्वार से अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया। सभी लोग बहुत दुखी हो गए। श्री जगदीश लाल साहिब जी ने धैर्य धारण किए रखा। वे सेवकों को सांत्वना देते हुए समझाने लगे कि – जो संत परमधाम जाते हैं उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए। माता तखत बाई जी ने कहा – यह संसार निरर्थक है। सुख और दुःख मानव जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं, दोनों आते जाते रहते हैं। उसी मनुष्य को श्रेष्ठ समझना चाहिए जो हर स्थिति में एक समान रहे। अब माता जी के जीवन का एकमात्र उद्देश्य बालरूप श्री जगदीश लाल जी का पालन करना था। वे स्नेह से उनका पालन करने लगीं और श्री हरमिलाप साहिब जी से सदा यही प्रार्थना करती रहतीं कि बालक जगदीश लाल जी कुशल रहें।

Shri Jagdish Lal Ji kept patience and gave solace to the devotees. He told them not to grieve for the saints who go to the Param Dham. Mata Takht Bai Ji said that this world is vulnerable and futile. Pleasure and pain are an inevitable part of human life, both keep coming and going. The one who remains indifferent in all circumstances is a true human being.

जो मनुष्य सतगुरु देव श्री चमन लाल साहिब जी के नाम का सुमिरन करता है वह धन्य है। उसके सभी सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं।

All the last rites of Satgurudev Shri Chaman Lal Sahib Ji were performed. Now the only objective of Mata Ji’s life was the upbringing of Shri Jagdish Lal Ji. She started bringing him up lovingly and continued to pray to Shri Harmilap Sahib Ji to always bless her son.

One, who recites the ‘Naam’ of Satgurudev Shri Chaman Lal Sahib Ji, is truely blessed and freed from all the earthly sufferings.