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Shri Chandrabhan Sahib Ji

श्री चन्द्रभान साहिब जी

श्री चन्द्रभान जी की गाथा गाऊं ।
    हृदय सतगुरु मूरत लाऊं ।।
जबहिं बिराजे सतगुरु राई ।
    भए सेवकन को सुखदाई ।।

श्री चन्द्रभान जी की गाथा गाऊं ।
    हृदय सतगुरु मूरत लाऊं ।।
जबहिं बिराजे सतगुरु राई ।
    भए सेवकन को सुखदाई ।।

Shri Chandrabhan Sahib Ji

श्री चन्द्रभान साहिब जी

Satgurudev Shri Chandrabhan Sahib Ji was the Sixth Gurudev of the pious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. As was his name, so were his attributes. His temperament was as calm as that of the moon and the glow of his aura was as bright as that of the sun. His holy sight and touch had the power to destroy the sins of his worshippers.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर षष्टम गुरुदेव के रूप में सतगुरु देव श्री चन्द्रभान साहिब जी विराजमान हुए। नाम के अनुरूप ही उनमें गुण विद्यमान रहे। उनका स्वभाव चंद्रमा के समान शीतल तथा मुखमंडल पर सूर्य के समान तेज रहता। उनके दर्शन एवं चरण स्पर्श मात्र से ही भक्तों का कल्याण हो जाता।

Once, Shri Satgurudev Ji went to Jhang city. There lived his devotee, named Jai Singh. He was pleased to see Shri Satgurudev Ji. He bowed at Gurudev's feet and brought him to his home with love and respect. When people became aware of Gurudev’s presence, they started coming to pay obeisance to Shri Satgurudev Ji. Gurudev narrated to them the sacred saga of Shri Harmilap Sahib Ji, on hearing which, people experienced ethereal peace.

श्री सतगुरु देव जी संगत के साथ भिन्न-भिन्न स्थानों पर सेवकों के कल्याण हेतु जाते। एक बार वे झंग शहर गए। वहां पर जयसिंह नाम का एक सेवक रहता था। श्री सतगुरु देव जी के दर्शन करके वह बहुत प्रसन्न हुआ और उनके श्री चरणों में बार बार नमन करते हुए आदर सहित उन्हें अपने घर ले आया तथा सुंदर आसन पर विराजमान करके बहुत प्रकार से सेवा की। नगर निवासी श्री सतगुरु देव जी के दर्शन करने आते और श्री सतगुरु देव जी सभी को श्री हरमिलाप पावन गद्दी के गुरू साहिबान जी की पावन गाथा सुनाते, जिसे सुनकर वे सब असीम सुख एवं शांति का अनुभव कर आनंद मग्न हो जाते।

One day, Jai Singh hesitatingly requested Gurudev that he wanted to be blessed with a wish. Gurudev asked about his wish and assured him that his every wish would be fulfilled. Jai Singh said that the only thing in this world he wanted and loved was the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji. Gurudev said, “Amen!” he would love only the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji. His name gives bliss and peace. In whose heart is the presence of Shri Harmilap Sahib Ji, all his earthly tribulations are undone. Thereafter, Gurudev forcibly granted him the boon that his descendent would adorn the Guru Gaddi. Jai Singh begged not to be given that boon as he was too menial to take it up. He graciously prayed to Gurudev to bless him with just the service of Guru Darbar in his every birth. Gurudev said, “What the saints say unassumingly, that cannot be untrue.”

एक दिन जयसिंह ने दोनों हाथ जोड़ कर सकुचाते हुए श्री सतगुरु देव जी से प्रार्थना की – हे गुरुदेव ! मैं आपसे एक वर मांगना चाहता हूं। श्री सतगुरु जी ने कहा-जयसिंह तुम नि:संकोच कहो, हम तुम्हारी हर इच्छा पूर्ण करेंगे। तब उसने कहा - मुझे संसार में श्री हरमिलाप साहिब जी का नाम सबसे प्यारा लगे। श्री सतगुरु देव जी ने कहा – ऐसा ही होगा और तुम्हें श्री हरमिलाप साहिब जी का नाम ही सबसे प्यारा लगेगा। उनका नाम बहुत ही सुख देने वाला है। जिसके हृदय में श्री हरमिलाप साहिब जी का वास होता है, उसके सभी सांसारिक कष्टों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही श्री सतगुरु देव जी ने उसे , हठात् यह वरदान भी दिया कि - तुम्हारे वंशज श्री हरमिलाप पावन गुरुगद्दी पर विराजमान होंगे। जयसिंह ने कहा – गुरुदेव ! यह वर मत दीजिए। हम तो आपके सेवक ही रहेंगे अपितु हमें यह वर दीजिए कि हम जन्म-जन्मान्तरों तक गुरु दरबार की सेवा करते रहें। तब श्री सतगुरु देव जी ने कहा – संतों के मुख से जो वचन सहज ही निकल जाता है, वह असत्य नहीं होता और फिर यह वरदान भी तो श्री हरमिलाप पावन गुरुगद्दी की सेवा के लिए ही है।

Jai Singh prayed to Shri Satgurudev Ji to enlighten him with the characteristics of a guru bhakt. Gurudev explained to him humbly that the one, who believes in Guru as the God, treats no other mantra as guru mantra, treats the parents as his deity, keeps himself away from pride, deceit and fraudulence, always feels the presence of Gurudev in his heart. Jai Singh was pleased to know that.

जयसिंह ने श्री सतगुरु देव जी से गुरु भक्त के लक्षण जानने की इच्छा जताई। श्री सतगुरु देव जी ने उसे प्रेम से समझा कर कहा कि – जो सतगुरु को ईश्वर के समान माने, गुरुमंत्र के समान कोई और मंत्र न समझे, माता-पिता को प्रथम देवता समझे, अभिमान एंव छल-कपट आदि दोषों से दूर रहे और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करे, ऐसा मनुष्य भक्तिभाव वाला होता है और उसके हृदय में श्री सतगुरू देव भगवान स्वयं निवास करते हैं। जयसिंह श्री सतगुरु देव जी से गुरू भक्त के लक्ष्ण समझकर बहुत प्रसन्न हुआ।

Thereafter, Gurudev came to Chanyot and stayed at ‘Shri Harmilap Thakur Dwara’. Devotees came everyday in large numbers to revere him. After staying there for some time, Gurudev left for Sargodha. He asked the natives about the path. One old man informed him that on one path, a fierce ghost lived who harassed the wayfarers. He advised another path, which was a few miles longer, would be safer for him.

एक बार श्री सतगुरु देव जी सरगोधा जा रहे थे। रास्ते में जाते हुए दो मार्ग दिखाई देने पर उन्होंने वहां के निवासियों से पूछा- सरगोधा जाने के लिए जो रास्ता छोटा हो वह हमें बता दो। एक बूढ़े व्यक्ति ने पास आकर प्रेम भरी वाणी से कहा- आप तो स्वयं ब्रह्म स्वरूप हैं, यह हमारा सौभाग्य है कि जो सबको राह दिखाने वाले हमसे राह पूछ कर हमें मान दे रहे है, फिर उसने श्री सतगुरू जी के श्री चरणों में नमन करते हुए बताया कि – इस रास्ते में एक बहुत ही भयानक और मायावी प्रेत रहता है जो यात्रियों को बहुत कष्ट देता है और यह दूसरा रास्ता चाहे एक योजन बड़ा है पर वह आपको सुविधाजनक रहेगा।

But, Gurudev carried on the path where the ghost lived. When the ghost saw Shri Satgurudev Ji, it started spreading delusional images. There spread a deep darkness and ghosts began to appear everywhere. There were flames of fire all around giving an illusion of funeral pyres. And then, the wicked ghost came. Shri Satgurudev Ji threw a straw at it, which hit it like an arrow made of iron. It fell unconscious. On regaining consciousness, it ran with its mouth ajar with fright. Gurudev cast a spell. Fire started burning it. It came running, fell down at Gurudev’s feet and prayed for mercy. Shri Satgurudev Ji felt pity and alighted from the horse. He touched the ghost softly. At once, the ghost turned into a man and subsequently freed from all the bonds.

श्री सतगुरु देव जी ने सेवकों से कहा कि जाकर देखना चाहिए वह कौन सा प्रेत है जो झूठी माया को सच्चा दिखाता है। यह कह कर वे संगत के साथ उसी रास्ते पर चल पड़े जिसमें प्रेत रहता था। जब प्रेत ने श्री सतगुरु देव जी को उस रास्ते पर आते हुए देखा तो अपनी माया फैलाने लगा। वहां पर बहुत घना अंधेरा छा गया, चारों तरफ भूत व बेताल इकठ्ठे हो गए, हर तरफ आग प्रकट होने लगी और शमशान के जैसा दृश्य बन गया। इतने में दुष्ट प्रेत भयानक रूप धारण कर सामने आ गया। श्री सतगुरु देव जी ने उस पर तिनका फेंका जो उसे व्रज की तरह लगा जिससे वह मूर्छित हो गया और मूर्छा दूर होने पर पुनः वह मुंह को फैलाकर श्री सतगुरु देव जी की तरफ दौड़ा, सभी सेवक डर के मारे कांपने लगे व गुरुदेव को पुकारने लगे। तब श्री सतगुरु देव जी ने तुरंत लीला की जिससे उसके शरीर में आग भड़क उठी। वह भागता हुआ आया और श्री सतगुरु देव जी के चरणों में गिरकर उनसे दया करने के लिए विनती करने लगा कि मैं बहुत पापी व नीच हूं, मुझ पर कृपा करो। श्री सतगुरु देव जी को उस पर दया आ गई, वे घोड़े से उतरे और उसे स्पर्श किया, स्पर्श करते ही प्रेत को देव देही प्राप्त हो गई और श्री सतगुरु देव जी कृपा से वह सब बंधनों से छूट गया।

Gurudev asked him about the curse by which he had turned into a ghost. He said that he was the helper of Satgurudev Shri Raja Ram Sahib Ji (Third Gurudev of the pious Gaddi). His name was Ritu Ram. He used to serve at the Guru Darbar but his heart was full of treachery. He used to steal many things from there. Though Shri Satgurudev Ji was aware of all his misdeeds but he never said anything to him. One day, he stole the benefaction of one of the devotees. When Shri Satgurudev Ji came to know, he got very angry and cursed him to become a ghost and stay in a jungle. He fell down at Gurudev’s feet and begged to get rid of this curse. Gurudev said when Shri Chandrabhan Ji would come to the jungle, there would start a fight with him, unknowingly, and then he would be released from the curse. After telling his story, the ghost bowed at Satgurudev Shri Chandrabhan Ji’s feet and went from there.

श्री सतगुरु देव जी ने उससे पूछा – तुम कौन से श्राप वश पिशाच बने थे। वह बोला – मेरा नाम रितु राम था। मैं श्री हरमिलाप पावन गद्दी के तृतीय गुरुदेव श्री राजा राम साहिब जी का सेवक था। वे अत्यंत दयालु, कोमल एवं शील स्वभाव के थे एवं मुझसे बहुत प्रेम करते थे। मैं भी सेवा तो बहुत करता था परंतु मेरे मन में कपट भरा था। मैं वहां से वस्तुएं चुराया करता। अंतर्यामी श्री सतगुरु देव जी सब कुछ जानते थे। बार बार ऐसा करने पर एक दिन श्री सतगुरु देव जी ने मुझे अपने पास बिठा कर बहुत समझाया कि अन्तर मन शुद्ध रखो परन्तु मैं नीच बुद्धि , कुछ समझ न सका और चोरी करता रहा। एक दिन एक सेवक गुरुदेव के लिए जो भेंट लेकर आया था, वह मैंने चुरा ली। जब श्री सतगुरु देव जी को पता चला तो वे गुस्से से बोले – रे पिशाच! तू मानता क्यों नहीं, जाओ जाकर भूतों के घर में निवास करो। मेरे कर्म ही मुझे जला रहे थे।मैंने श्री सतगुरु देव जी के चरणों में गिरकर दुखद पुकार की कि – हे गुरुदेव! मुझे इस श्राप से किस प्रकार मुक्ति मिलेगी। दयालु श्री सतगुरु देव जी ने कहा - श्री हरमिलाप पावन गद्दी के षष्टम गुरुदेव श्री चन्द्रभान साहिब जी तुम्हारे पास आएंगे। फिर अंजाने में तुम्हारा उनसे युद्ध होगा, तब तुम्हारा कल्याण होगा। उस समय तक तुम पिशाच बनकर जंगल में जाकर रहो। वह बोला - हे गुरुदेव! आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया हूं, मेरे सभी पाप मिट गए हैं। फिर वह श्री सतगुरु देव जी को प्रणाम करके उनके धाम चला गया। श्री सतगुरु देव भगवान की यह लीला देख कर सभी सेवादार चकित रह गए।

Staying with his devotees for some time, Shri Satgurudev Ji returned to Dera. A long time passed. When his last time was near, he gave the knowledge of Guruneeti to his son Shri Chaman Lal Ji and conferred him the Guru Gaddi. Thereafter he took samadhi and set forth to Param Dham.

कुछ समय तक सरगोधा अपने सेवकों के पास रहने के बाद श्री सतगुरु देव जी डेरे पर वापस आ गए। इस प्रकार बहुत मंगलमय समय व्यतीत हो गया। एक दिन उन्होंने अपने सुपुत्र श्री चमन लाल जी को गुरुनीति का ज्ञान देकर उन्हें पावन गुरुगद्दी पर विराजमान किया। उसके बाद श्री सतगुरु देव जी ने समाधि लगा ली और परमधाम चले गए।

There is no one as forgiving as Shri Satgurudev Ji. One should recite devotedly the ‘Naam’ of Gurudev, as it is the essence of all the contentment.

गुरु के समान क्षमा कर देने वाला और कोई नहीं है। गुरु का नाम सभी सुखों का सार है इसलिए मनुष्य को प्रेम से गुरु के नाम का बारम्बार सुमिरन करना चाहिए।