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Shri Bhawani Das Sahib Ji

श्री भवानी दास साहिब जी

श्री भवानी दास साहिब सुखरासी ।
    अंतर्यामी घट घट वासी ।।
गुरु गद्दी ते जबहिं बिराजे ।
    पिता समान रहें जिमि राजे ।।

श्री भवानी दास साहिब सुखरासी ।
    अंतर्यामी घट घट वासी ।।
गुरु गद्दी ते जबहिं बिराजे ।
    पिता समान रहें जिमि राजे ।।

Shri Bhawani Das Sahib Ji

श्री भवानी दास साहिब जी

Satgurudev Shri Bhawani Das Sahib Ji was the Fifth Gurudev of the sacrosanct Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His extremely lenient approach brought him closer to his worshippers. He abhorred shrewdness and deceit. He loved people with a pure heart and had a courteous nature. An illuminated aura and pure bliss prevailed around him.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के पंचम सतगुरु देव श्री भवानी दास साहिब जी महाराज अंतर्यामी, घट-घट वासी तथा सुखों के भंडार हैं। उनकी अत्यंत सुंदर छवि भक्तों के मन को मोह लेती। सारे संसार के आधार श्री सतगुरु देव जी को सेवक अपने पुत्र के समान प्रिय लगते। दूर दूर से सेवक, श्रद्धालु व प्रेमी उनके दर्शन के लिए आते एवं मनवांछित फल पाते।

One day a man named Devdutt came to Shri Satgurudev Ji. He told Gurudev that leaving behind everyone, he had come to his recourse. He was helpless, poverty stricken and had struggled throughout his life to eke out a living. He cried relentlessly and begged him to give what the Almighty had written in his fate, once and for all. Gurudev said, “One's sins are one's own faults, so the brunt of deeds has to be borne by oneself only. Destiny cannot be changed, though the learners lose patience during tough times.” Devdutt said that Gurudev was right, but by all means, he only was accomplished and versed so only he can help him overcome his miseries. Gurudev can change the course of a river at his behest, forgive even the most evil sinners, if he wishes, then why he could not end his suffering?

एक दिन श्री सतगुरु देव जी के द्वार पर देवदत नाम का एक अत्यंत दरिद्र व्यक्ति आया और रोते हुए उनसे से कहा कि – हे गुरुदेव! हर तरफ से हताश हो कर मैं आपकी शरण में आया हूं। मैं बहुत ही दीन और असहाय हूं। जीवन पर्यन्त पेट भर खाने के लिए तरसता रहा हूं। यह भयानक दुख अब मुझसे और नहीं सहा जाता अतः हे दीनदयालु गुरूदेव! मेरी किस्मत में जो कुछ भी लिखा है, कृपा करके वह सब कुछ मुझे एक बार में ही दे दीजिए। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और यह कहते कहते वह धीरज खोने लगा। श्री सतगुरु देव जी ने तब उससे ये वचन कहे कि – विधाता ने माथे पर जो लिख दिया है, उसे कोई नहीं मिटा सकता। कर्मों की गति बहुत बलवान है। होनी तो होकर रहती है लेकिन कठिन समय में धैर्य नहीं खोना चाहिए। तब देवदत बोला – हे दयालु, हे कृपालु आप जो कह रहे हैं वह सत्य है। सूर्य अपनी दिशा तो कभी नहीं बदल सकता किन्तु एक राजा नदी के ऊपर बांध बनवा कर उसके बहाव की दिशा बदल सकता है। जो दुख मेरी प्रारब्ध में हैं वह तो हमें भोगने ही हैं लेकिन आपकी कृपा से मेरे सारे दुख दूर हो सकते हैं क्योंकि आप हर प्रकार से से समर्थ और सर्वशक्तिमान हो। आपकी शरण में आने के बाद तो प्रारब्ध भी बदल जाती है और आप ही हो जो भाग्य की लिखा भी बदल सकते हो। हे गुरुदेव! आप तो समस्त पापियों का उद्धार करते हो तो मेरे कष्ट भी दूर कर दीजिए।

On seeing him so aggrieved, Gurudev felt pity. He took out a small cotton towel, put three handful of soil in it and tied a knot. Then he gave that bale to Devdutt and told him to open it at home. When Devdutt reached home, he untied the knot of the bale and was surprised to see what it contained. Gurudev had put soil in the towel with his own hands and it had miraculously turned into gold! He was overwhelmed with joy. Many thoughts came to his mind. Devdutt had then become rich and prosperous. His belief in Gurudev had become stronger and Shri Satgurudev Ji had freed him from miserable poverty.

जिसके ऊपर सतगुरु देव जी की कृपा हो जाती है, उसे किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता। देवदत्त को दुखी देखकर श्री सतगुरु देव जी ने उस पर कृपा करके उसे अनेक प्रकार से धीरज दिया और फिर हाथ में एक गमछा लेकर उसमें तीन मुट्ठियां मिट्टी डालकर और गांठ बांध के देवदत को देते हुए बोले कि इसको घर जाकर ही खोलना।

Shri Satgurudev Ji, with some of his followers, went to different places for the welfare of his devotees. After visiting many villages, Shri Satgurudev Ji came to Chanyot city. He built a Bhawan there and named it 'Shri Harmilap Thakur Dwara'. Amenities like food and shelter were provided there. After spending time with his devotees at different places, Shri Satgurudev Ji came back home.

वह बहुत खुश हुआ कि श्री सतगुरु देव जी ने मेरे कष्टों को दूर कर दिया है, परन्तु मिट्टी को देखकर उसके मन में यह संशय बना ही रहा कि श्री सतगुरू देव जी ने मुझे यह क्या दिया है। घर पहुंच कर जब गमछे की गांठ खोली तो आश्चर्यचकित रह गया। मुझे तो मिट्टी का भ्रम हुआ था परन्तु यह तो स्वर्ण है। यह चमत्कार देखकर देवदत बहुत प्रसन्न हो गया व थोडे ही समय में संपन्न और समृद्ध बन गया। जिस क्षण से मिट्टी स्वर्ण में बदल गई थी,उसकी श्रद्धा श्री सतगुरु देव जी में बहुत बढ़ गई। जिस किसी का भी श्री सतगुरु देव जी के चरणों में निस्वार्थ व गहरा प्रेम होता है, वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। श्री सतगुरु देव जी ने देवदत को पहले निर्धनता एवं फिर आवागमन के चक्कर से मुक्त कर दिया।

There lived a merchant named Dasu Ram. One day, he came to Shri Satgurudev Ji. He bowed at Gurudev’s feet and asked for his consent to go abroad for business. Gurudev agreed and blessed him. With the image of Shri Satgurudev Ji nestled in his heart, Dasu Ram started his journey. He visited many countries, collected various goods and boarded a ship on return. When they were in the last few miles to their destination, a hurricane struck the ship.

कुछ समय बाद श्री सतगुरु देव जी संगत को साथ लेकर भिन्न-भिन्न स्थानों पर सेवकों का कल्याण करने के लिए गए। अनेक स्थानों से होते हुए वेचनयोट आ गए और वहां एक भवन बनवाया जिसका नाम ‘श्री हरमिलाप ठाकुर द्वारा’ रखा। जहां पर भोजन प्रसाद तथा ठहरने की सुविधाएं प्रदान की। सेवक नित्यप्रति वहां आते व श्री हरमिलाप पावन गद्दी के गुरु साहिबान की गाथा कहते जिससे वह स्थान बहुत प्रसिद्ध हो गया। कुछ समय तक सेवकों के पास रहने के बाद श्री सतगुरु देव जी अपने डेरे वापस आ गए।

Travelers started crying in panic. Dasu Ram became fidgety and started praying to Shri Satgurudev Ji to save him. When Shri Satgurudev Ji heard his desperate prayer, he rushed to save the sinking ship. He tied a rope and started pulling the ship towards the shore. Shri Satgurudev Ji was walking on the surface of the ocean as if he was walking on land. He dragged the ship up the shore and disappeared. Where the ship anchored, Dasu Ram had managed to catch a glimpse of Shri Satgurudev Ji. After disembarking, he went straight to Shri Satgurudev Ji. He bowed his head at Gurudev’s feet again and again and said that if he had not saved him, all his happiness, wealth and life would have been ruined. There was nothing in this world which he could present in return to Gurudev for saving his life. Shri Satgurudev Ji said that it was not his favor, but the graciousness of Shri Harmilap Sahib Ji that his life had been saved. Dasu Ram bowed in reverence and went back.

वहां पर दासू राम नाम का एक व्यापारी सेवक रहता था। एक दिन वह श्री सतगुरु देव जी के पास आया और उनके चरणों में प्रणाम करते हुए उसने व्यापार के लिए विदेश जाने की आज्ञा मांगी। श्री सतगुरु देव जी ने उसे आशीर्वाद दिया और वह श्री सतगुरु देव जी की सुंदर छवि हृदय में धारण कर विदेश यात्रा के लिए चल पड़ा। भिन्न-भिन्न देशों का भ्रमण करके उसने बहुत सारी वस्तुएं एकत्रित की और वापस आने के लिए जहाज पर सवार हो गया। जब उनके गंतव्य से कुछ ही मील का फासला रह गया तो भयंकर तूफान आ गया। यात्री भयभीत होकर हाहाकार करने लगे। दासू राम अत्यंत अधीर एवं व्याकुल होकर श्री सतगुरु देव जी से इस संकट से उबारने की प्रार्थना करने लगा।

More time elapsed. One day, Shri Satgurudev Ji called his son Shri Chandrabhan Ji and explained to him the Guruneeti and ceded him the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He himself took Vanprastha. Living indoors, he started spending time in chanting, austerity and abstinence. He had committed mind to the devotion of Shri Harmilap Sahib Ji only.

अंतर्यामी श्री सतगुरु देव जी ने जब दासू राम की पुकार सुनी तो उसकी डूबती नैया को पार लगाने के लिए शीघ्रता से वहां पहुंच गए। उन्होंने जहाज में रस्सी बांधी और उसे किनारे की ओर खींचने लगे। वे पानी पर ऐसे चल रहे थे जैसे पृथ्वी पर ही चल रहे हों। जहाज किनारे पर लगा कर वे अंतर्धान हो गए। जब जहाज ने लंगर डाला तब दासू राम को श्री सतगुरु देव जी की एक झलक दिखाई दी। जहाज से उतर कर वह सीधा श्री सतगुरु देव जी के द्वार पर गया और उन्हें बार-बार प्रणाम करते हुए कहने लगा कि – हे दीनदयालु, यदि आज आप मेरी रक्षा न करते तो मेरा सुख, संपत्ति और जीवन सब नष्ट हो जाता। आपने इस असहाय पर बहुत कृपा की है। इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मैं आपको इस उपकार के बदले दे सकूं। श्री सतगुरु देव जी ने कहा कि – इसमें मेरा कोई उपकार नहीं है, यह तो श्री हरमिलाप साहिब जी की कृपा हुई है जिससे तुम्हारे जीवन एवं संपति की रक्षा हुई है। दासू राम श्री सतगुरु देव जी को श्रद्धापूर्वक नमन कर के घर चला गया।

One day, Brahmrishi Naarad Ji came to Shri Satgurudev Ji and bowed at his feet. He was delighted to have the divine sight of Shri Satgurudev Ji. Gurudev welcomed him with folded hands. Naarad Ji said that Brahma Ji told him to go to Prithviloka and have a glimpse at the holiness of Satgurudev Shri Bhawani Das Ji Maharaj, who is adorning the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji, whose immense glory could not be surpassed. Naarad Ji said that Brahma Ji also told him, “God himself will incarnate as the son of your Tenth Guru, who will be another beacon of light for the name of Shri Harmilap Sahib Ji.” Singing praises of Satgurudev Shri Bhawani Das Sahib Ji, Naarad Ji went back to Brahmloka.

इस प्रकार मंगलमय समय व्यतीत होता रहा। एक दिन श्री सतगुरु देव जी ने अपने सुपुत्र श्री चन्द्रभान जी को बुलाया और उन्हें गुरुनीति का ज्ञान देकर पावन गुरुगद्दी पर विराजमान किया एवं स्वयं वानप्रस्थ धारण कर लिया। उन्होंने अपने मन की वृति को अलख निरंजन परमात्मा में लगा लिया और भवन के भीतर ही रहकर जप, तप और संयम में ही अपना जीवन व्यतीत करने लगे। आनंद देने वाले सुजान श्री सतगुरु देव जी अब बिल्कुल निर्मल ज्ञानवान विष्णु स्वरूप हो गए।

One day, Shri Satgurudev Ji called his relatives and devotees and told them about the prediction of Naarad Ji. He explained to his son, Shri Chandrabhan Sahib Ji, to be kind to the servitors, treat them like sons and narrate to them the sacred saga of the gracious Shri Harmilap Sahib Ji. Then Gurudev told him that he wanted to go to Satyaloka. He asked him not to grieve but to recite the ‘Naam’. After that, Shri Satgurudev Ji took samadhi, gave up his life through Brahmdwar and moved on to Satyaloka.

उनके दर्शन करने के लिए एक दिन ब्रह्मऋषि नारद जी वहां आए। उन्होंने श्री सतगुरु देव जी का अभिवादन किया, दोनों हाथ जोड़कर श्री सतगुरु देव जी ने भी ऋषि जी को नमस्कार किया और दोनों एक दूसरे के दर्शन पाकर बहुत आनंदित हुए। ऋषि जी बोले – मुझे ब्रह्मा जी ने कहा है कि पृथ्वीलोक में जाकर श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर विराजमान सतगुरु देव श्री भवानी दास साहिब जी से दर्शन मिलाप करो। उनकी महिमा का पार नहीं पाया जा सकता , साथ ही यह भी कहा कि श्री हरमिलाप पावन गद्दी के दसवें गुरु के घर में स्वयं परमात्मा पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। ऋषि जी एवं सतगुरु देव श्री भवानी दास साहिब जी ने कुछ देर परस्पर धर्म और आध्यात्मिकता पर चर्चा की और उसके बाद ऋषि जी ब्रह्मलोक वापस चले गए।

श्री सतगुरु देव जी ने एक दिन अपने सभी संबंधियों व सेवकों को बुलाकर नारद जी का आगमन व उनकी भविष्यवाणी बताई। फिर श्री चन्द्रभान साहिब जी को समझाने लगे कि – सेवकों को अपने पुत्र समान समझ कर उन्हें सुख देना एवं श्री हरमिलाप पावन गद्दी के सभी गुरु साहिबान जी की गाथा सुनाना। फिर श्री सतगुरु देव जी ने कहा कि – अब हम सत्यलोक जाना चाहते हैं। तुम शोक न करना अपितु नाम का जाप करना। उसके बाद श्री सतगुरु देव जी ने समाधि लगा ली और ब्रह्मद्वार से अपने प्राणों का विसर्जन कर सत्यलोक में गमन किया।

उनके जीवन की गाथा संसार में सुशोभित हो रही है। जो भी श्री सतगुरु देव जी की गाथा को पढ़ता है, उसे किसी प्रकार की बाधा नहीं रहती।