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Shri Khan Chand Sahib Ji

श्री खान चन्द साहिब जी

ऐसो साहिब पाएयो, जो अति दीन दयाल ।
    गुन निधान समरथ प्रभु, जानत हैं तिहूं काल ।।

ऐसो साहिब पाएयो, जो अति दीन दयाल ।
    गुन निधान समरथ प्रभु, जानत हैं तिहूं काल ।।

Shri Khan Chand Sahib Ji

श्री खान चन्द साहिब जी

Satgurudev Shri Khan Chand Sahib Ji was the Fourth Gurudev of the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He was a noble hearted, sympathetic and truely divine in all respects. His aura was always shining like the sun. People from far off places came for a mere glimpse of his divine presence. Shri Satgurudev Ji blessed them and lifted their sufferings.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के चतुर्थ सतगुरु देव श्री खान चन्द साहिब जी अत्यंत दयालु, हर प्रकार से परिपूर्ण, सुखों के भंडार एवं सूर्य के समान तेजस्वी हैं। दूर-दूर से सेवक श्रद्धालु व प्रेमी उनके दर्शन के लिए आते। श्री सतगुरु देव जी उन्हें आशीर्वाद देकर उनके सभी प्रकार के दैहिक, दैविक व मानसिक तापों को दूर कर देते और उन्हें किसी भी प्रकार का दुःख एवं दरिद्रता न रहती।

Shri Satgurudev Ji visited different places to meet his devotees. Once, he went to Multan, where lived his worshipper Brahmin Mansa Ram. He was delighted to see Shri Satgurudev Ji and bowed at his feet in reverence. Then he brought him home and served him with reverence. Gurudev asked the Brahmin why he had remembered him yesterday and that he had come there only for him. Brahmin told Gurudev that he had only one son who was on deathbed. Becoming totally distraught with that terrible pain, he had evoked him because he had no one else in the world except Shri Satgurudev Ji. His eyes welled. He fell down at Shri Satgurudev Ji's feet and begged him to answer his prayers.

श्री सतगुरु देव जी भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपने सेवकों के कल्याण हेतु जाते। एक बार वे मुलतान गए। वहां पर उनका एक सेवक, ब्राह्मण मनसा राम, रहता था। श्री सतगुरु देव जी का आगमन सुनते ही वह शीघ्रता से उठ भागा व उनके दर्शन कर के हर्ष से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया। उसने श्रद्धापूर्वक श्री सतगुरु देव जी को दंडवत प्रणाम किया। फिर उन्हें आदरसहित घर ले आया और आसन पर विराजमान करके उन्हें भोजन प्रसाद का भोग लगवाया।

Gurudev consoled the Brahmin and told him to recite the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji and his wish would be fulfilled. Then Gurudev asked for his son. Brahmin took him to where his son was lying on bed. On seeing the child unconscious, Gurudev kept his merciful hand on the child's forehead and wiped away all his sufferings. The child opened his eyes. Brahmin was surprised to see his son back in a conscious state. Gurudev had erased all his illness in a moment. The child got up and bowed to Shri Satgurudev Ji. Shri Satgurudev Ji told Brahmin that, by the grace of Shri Harmilap Sahib Ji, the child no longer had any disease. The Brahmin was delighted and relieved and praised Shri Satgurudev Ji’s divinity.

श्री सतगुरु देव जी ने उससे पूछा कि- हे विप्र! हमें किसलिए याद किया था, हम जा तो किसी ओर दिशा में रहे थे परन्तु हमारा मन इस दिशा की ओर खिच रहा था, हमारे अंर्तमन की दशा को समझते हुए हमारा घोडा भी बार बार इसी दिशा की ओर मुड रहा था। बोलो तुम्हें क्या कष्ट है, हम तुम्हारे कार्य के लिए ही यहां आए हैं। ब्राह्मण बोला- हे गुरुदेव! मेरा एक ही पुत्र है जो असाध्य रोग से पीडित है। एक वैद्य ने मुझे बताया है कि अब उसका जीवन नहीं बचेगा। गुरूदेव! पुत्र के बिना मेरा जीवन सूना हो जाएगा, इस भयानक दुःख से घबरा कर ही मैंने आपको पुकार लगाई थी। इस संसार में आपके बिना मेरा और कोई नहीं है। इतना कहते ही उसकी आंखों से अश्रु बहने लगे और वह श्री सतगुरु देव जी के चरणों में गिरकर विनती करने लगा कि - मुझ दीन की पुकार सुन लीजिए।

He prayed to Gurudev to enlighten him how one could get rid of the delusion spread in this limitless world. Shri Satgurudev Ji told him that this hindrance could be removed by the light of wisdom of Gurudev and serving Guru Darbar. Brahmin hailed Gurudev and fell at his feet with reverence. Gurudev blessed him and then proceeded to meet his other servitors.

श्री सतगुरु देव जी ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और धीरज देते हुए पूछा कि - तुम्हारा पुत्र कहां है। ब्राह्मण श्री सतगुरु देव जी को पुत्र के पास ले गया। बालक को मूर्छित देखकर श्री सतगुरु देव जी ने उसके सिर पर अपना कृपा रुपी हाथ रखकर उसके सभी कष्टों को दूर कर दिया। बालक ने आंखें खोली और उठकर श्री सतगुरु देव जी के चरणों में प्रणाम किया। ब्राह्मण अपने पुत्र को होश में आया देखकर विस्मित एवं प्रफुल्लित हो गया। श्री सतगुरु देव जी ने उसके सब रोग क्षण भर में ही दूर कर के ब्राह्मण से कहा कि इस बालक पर श्री हरमिलाप साहिब जी की कृपा हो गई है। अब यह पूर्ण रुप से रोगमुक्त हो गया है। श्री हरमिलाप साहिब जी के नाम का सुमिरन करने से सब मनोकामनाए पूर्ण हो जाती हैं। ब्राह्मण फिर बहुत प्रसन्न हो गया और श्री सतगुरु देव जी की स्तुति करते हुए "गुरु प्रणाली" गाने लगा।

After staying at different places for some time, Gurudev returned home. Time elapsed. One day, he called his son Shri Bhawani Das Ji and explained to him the Guruneeti. Then he did the tilak and handed over to him the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. Next day, Gurudev took samadhi, gave up his life and went to live in the supreme abode.

तत्पश्चात उसने श्री सतगुरु देव जी से विनती की कि यह बताने की कृपा करें कि इस संसार में फैली असीम माया से किस प्रकार छुटकारा मिल सकता है। श्री सतगुरु देव जी ने तब उससे ये वचन कहे कि – गुरुदेव के ज्ञान रुपी प्रकाश एवं गुरु दरबार की सेवा से ही से ही माया का भ्रम जाल रुपी अंधकार दूर हो जाता है। ब्राह्मण श्री सतगुरु देव जी की जय-जयकार करने लगा और उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। श्री सतगुरु देव जी ने उसे आशीर्वाद दिया और वहां से विदा होकर अन्य सेवकों के पास चले गए। सेवको के कल्याण के लिए श्री सतगुरू देव जहाँ जहाँ जाते वहां सेवको की सुख समृद्धि बढती जाती। विभिन्न स्थानों पर कुछ समय तक रहने के बाद श्री सतगुरु देव जी डेरे पर वापस आ गए।

Countless virtues of Shri Satgurudev Ji are spreading light of knowledge everywhere. Truely, no one is as magnanimous as Shri Satgurudev Ji.

इस प्रकार मंगलमय समय व्यतीत होता रहा। एक दिन श्री सतगुरु देव जी ने अपने सुपुत्र श्री भवानी दास जी को बुलाया और उन्हें बहुत प्रकार से गुरुनीति का ज्ञान दिया। फिर उन्हें तिलक लगाकर पावन गुरुगद्दी पर विराजमान किया। अगले दिन प्रातः श्री सतगुरु देव जी ने समाधि लगा ली और परमधाम को गमन किया।

श्री सतगुरु देव जी की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। इस संसार में उनके समान दयालु और हित करने वाला कोई नहीं है। वह मनुष्य धन्य है जो श्री सतगुरु देव जी की छत्र छाया में रहता है।