A A A             हिंदी

attribute10

Shri Raja Ram Sahib Ji

श्री राजा राम साहिब जी

आगिल गाथा सुनो मन लाई ।
    जो मोहे पिता कही हर्षाई ।। सतगुरु के गुन कोऊ न जाने ।।
    शेष महेष न जाए बखाने ।।

आगिल गाथा सुनो मन लाई ।
    जो मोहे पिता कही हर्षाई ।। सतगुरु के गुन कोऊ न जाने ।।
    शेष महेष न जाए बखाने ।।

Shri Raja Ram Sahib Ji

श्री राजा राम साहिब जी

Satgurudev Shri Raja Ram Sahib Ji was the Third Gurudev of the pious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He had entered the mortal world for the well being of his devotees. He had many followers in various parts of the country. One day, a follower from Ghazni came and presented him a beautiful skewbald horse. Riding on this horse, Shri Satgurudev Ji visited different places tending to welfare of the people.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर विराजमान तृतीय सतगुरु देव, बाल ब्रह्मचारी श्री राजा राम साहिब जी भक्तों के हित के लिए अवतार लेकर आए। देश के विभिन्न प्रांतों से सेवक , श्रद्धालु व प्रेमी आकर उनके दर्शन करते और श्री सतगुरू देव उनके सभी कष्टों का निवारण करते। एक बार गजनी से एक सेवक उनके दर्शन के लिए आया। उसने श्री सतगुरु देव जी को एक चितकबरा घोड़ा भेंट किया जिस पर सवार होकर श्री सतगुरु देव जी सेवकों के कल्याण के लिए सब जगह जाते।

Two devotees of Shri Satgurudev Ji, namely, Brahmin Mool Chand and Baku Ram Bhatia lived in the Kot Moman village. Both Hindus and Muslims in that village were living peacefully. Cow-rearing was their only occupation. Every night they used to sit together and when Mool Chand narrated to them the unique saga of Shri Satgurudev Ji, their hearts were overwhelmed with love for Shri Satgurudev Ji.

कोट मोमन गांव में श्री सतगुरु देव जी के अनेक सेवक रहते थे। उनमें से ब्राह्मण मूल चंद तथा बकु राम भाटिया अनन्य भक्त थे। ये दोनों गुरूदेव को ईश्वर का रुप मानते व गुरू आज्ञा को ही सर्वोपरि मानते। उस गांव में हिंन्दू मुसलमान सब परस्पर मिलजुल कर रहते थे। गांव के अधिकतर लोगों का गऊ पालन का व्यवसाय था। वे सभी रोज रात को इकठ्ठे होकर बैठते। तब मूल चंद उन्हें श्री सतगुरु देव जी की लीलाएं विस्तार से सुनाता कि हमारे प्रथम गुरूदेव श्री हरमिलाप साहिब जी ने मृत ग्वाल को जीवित किया, द्वितीय गुरुदेव श्री कुन्ज भवन साहिब जी ने निर्जीव कच्ची दीवार को चार कोस तक चलाया, जिसे सुनकर सब लोग प्रेम विभोर हो जाते।

One day, about 300 dacoits attacked the village. People came to Brahmin Mool Chand for help. Mool Chand said that he was an unarmed Brahmin, then how he could resist those monstrous bandits? On hearing this, people got furious and demanded to call his Satguru who they heard him praise every day. They threatened the Brahmin that they would burn down his house and banish him from the village.

एक बार लगभग तीन सौ डाकुओं ने गांव पर आक्रमण कर दिया। गांव के लोग भागते हुए मूल चंद के पास सहायता के लिए आए। मूल चंद ने कहा कि – मैं ब्राह्मण जाति का शस्त्रहीन व्यक्ति हूं। इन राक्षसी बुद्धि वाले कठोर हृदय डाकुओं पर मेरा क्या जोर चल सकता है। यह सुनकर सभी गुस्से से भर गए और बोले कि –हमने तुमसे डाकुओं का विरोध करने या उनसे युद्ध करने के लिए नहीं कहा है बल्कि यह कह रहे हैं कि जिन सतगुरु की तुम रोज लीला सुनाते हो, उन्हीं को हमारी रक्षा के लिए बुलाओ। अगर आज तुम्हारे सतगुरु ने हमारी रक्षा न की तो हम समझेगे कि जो तुम अपने गुरूदेव की गाथा सुनाते रहे वह सब झूठ है और हम तुम्हारे घर को जला देंगे साथ ही तुम्हें इस गांव से बाहर निकाल देंगे।

Mool Chand got scared. He started praying to Shri Satgurudev Ji for his help. Gurudev was in the state of meditation at that time. He got to know everything. He stood up quickly and took a spear in his hand. Riding on his skewbald horse, Gurudev charged ahead, faster than the speed of the wind and reached the village in a few seconds. His presence created such a delusion there that the dacoits could not see anything.

मूल चंद उनकी धमकी भरी बातें सुनकर बहुत घबरा गया। वह श्री सतगुरु देव जी की स्तुति (जो कष्ट निवारण पाठ में विस्तृत रुप में सम्मिलित है) करने लगा और सहायता के लिए पुकारने लगा- हे गुरूदेव! कृपा करके आज मेरी लाज रख लो नहीं तो तुम्हारा ही उपहास होगा।

They panicked. Following the chaos, some of them were killed, few injured and the rest fled away. Thereafter, Gurudev went to the Brahmin's house and told him that the village was now safe. On hearing this, the Brahmin’s anguish vanished. When he looked back, he was amazed to see Shri Satgurudev Ji standing in front of him. He fell at his Guru’s feet in reverence and said that Gurudev had taken too much trouble to save them. Gurudev said, "Whenever one remembers me with a pure heart, I surely reach out to him to help him.”

अंर्तयामी श्री सतगुरु देव जी सब कुछ जान गए व सेवक की पुकार सुनकर उत्तेजित होकर वे शीघ्रता से उठे और हाथ में भाला लेकर बोले- हे अबलक घोडे! शीघ्र चल ताकि जल्दी से जाकर हम संकट में फसे अपने सेवक को सहारा दें। फिर वे अपने घोड़े पर सवार हो कर वायु की गति से भी तेज चल कर कुछ ही क्षणों में उस गांव में पहुंच गए। वहां पहुंच कर उन्होंने ऐसी माया फैलाई कि डाकुओं को कुछ दिखाई न दिया वे व्याकुल होकर इधर-उधर भागने लगे। कुछ डाकू मारे गए, कुछ घायल हो गए और बाकी जो बचे थे, वे डर कर भागते हुए बोले कि यह तो किसी गुरू या पीर का गांव है, हमारे तो वंशज भी इस गांव कभी नहीं आएगें। फिर सतगुरू देव जी ने अपनी फैलायी हुई सारी माया को समेट लिया और मूल चंद के घर पहुंच कर उससे बोले कि –हे तात ! हमने तुम्हारे सभी कष्टों का निवारण कर दिया है। श्री सतगुरु देव जी के अमृत भरे वचनों को सुनते ही ब्राह्मण की सब व्यथा दूर हो गई। जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो श्री सतगुरु देव जी को सम्मुख पाकर वह अत्यंत प्रसन्न हो गया और उसने दंडवत प्रणाम किया और बोला – हे गुरुदेव ! हमारे हित के लिए आपने बहुत ही कष्ट उठाया है। श्री सतगुरु देव जी ने ब्राह्मण को उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा – जो मुझे सच्चे हृदय से बुलाता है उसके लिए मैं बिना विलंब किए सभी कार्यों को छोड़ कर आ जाता हूँ।

Meanwhile, Baku Ram also came there and was pleased to see Shri Satgurudev Ji. He said that today they were alive by his grace only, else the dacoits would have killed them. He bowed humbly and asked what they could present to him, in return. Their only asset were the cattle. They humbly offered that whenever their cows would bear calves, they would present them to Shri Satgurudev Ji. Gurudev conceded to their prayer and disappeared.

इतने में बकू राम भी वहां आ गया। श्री सतगुरु देव जी के दर्शन कर वह बहुत प्रसन्न हुआ और बोला कि- आज हम आपकी कृपा से ही बचे हैं, नहीं तो हमारी मृत्यु निश्चित थी। हम आपकी महिमा का गुणगान कैसे करें। उसने आदर के साथ सिर को झुकाया और कहा कि- गुरूदेव आपकी कृपा का हम कैसे आभार व्यक्त करें। इस पर श्री सतगुरु देव जी ने कहा- सभी सेवक हमारे पुत्र समान हैंऔर सबके हित के लिए ही हम इस संसार में आए हैं। फिर सबने गुरुदेव के चरणों में विनती की कि कृपया हमारी तुच्छ भेंट स्वीकार करें, हमारी संपत्ति तो केवल बछड़े ही हैं, जब-जब हमारी गायों के बछड़े होंगे, हम आपको भेंट किया करेंगे। श्री सतगुरु देव जी ने उनकी विनती स्वीकार कर ली और वहां से अंर्तध्यान हो कर अपने स्थान आ गए।

There was another famous Gaddi of Lal Ji of which Shri Narsinh Das Ji was the Guru at that time. Shri Satgurudev Ji befriended him. Both of them followed the path set forth in the Vedas and often discussed religion and spirituality. One day, they were sitting on a beach and discussing Vedanta. Suddenly, a ferocious lion came and pounced at them. Shri Satgurudev Ji drew a line around him and kept sitting fearlessly. As the lion touched the line, it fell down. Shri Narsinh Ji then threw a straw at him, which struck him like a thunderbolt. The lion died, there and then.

वहां (कोटमोमन में )पर लाल जी की एक प्रसिद्द गद्दी थी, जिसके गुरु श्री नरसिंह दास जी थे। उनके साथ श्री सतगुरु देव जी की घनिष्ट मित्रता हो गई। दोनों परस्पर धर्म और आध्यात्मिकता पर चर्चा करते एवं वेदों में बताए मार्ग पर चलते। एक दिन दोनों समुद्र के किनारे बैठकर ब्रह्मविचार कर रहे थे। तभी वहां एक भयानक शेर आ गया और उनकी तरफ बढा। श्री सतगुरु देव जी ने तुरंत वहां पर एक रेखा खींच दी और निर्भय होकर बैठे रहे। जैसे ही शेर ने उस रेखा को स्पर्श किया तो एकदम पृथ्वी पर गिर पड़ा और बार बार प्रयत्न करने पर भी वह उस रेखा को पार न कर सका। कुछ समय बाद वह पुनः तमतमा कर उठा और मुख को फैला कर उनकी तरफ छलांग लगाई। श्री नरसिंह जी ने एक तिनका उस पर फेंक दिया जो उसे वज्र की तरह लगा। उसी समय शेर के प्राण निकल गए।

On realizing their unsurmountable power, their friendship grew stronger. One day, they both decided that the way they had loved each other in this world, they would go together to the Param Dham too. Shri Narsinh Ji wanted to go on a Sunday but Shri Satgurudev Ji wanted to go on a Monday. As was their wish, they decided to leave their mortal lives on the day they wanted but to be cremated together. Sunday morning, Shri Narsinh Ji took his last breath. His devotees planned the cremation. Shri Satgurudev Ji told them to cremate Shri Narsinh Ji the next day. Thereafter, Gurudev came back to his house. But the people did not listen to him. They took the body to the pier for cremation. Suddenly, there was a thunderstorm and complete darkness spread. Hence, the devotees were forced to give up the idea of cremation that day.

एक दूसरे की दिव्य शक्ति देखकर दोनों का आपस में प्रेम और बढ़ गया। एक दिन दोनों बैठकर परमधाम जाने के बारे विचार करने लगे कि जिस प्रकार इस संसार में प्रेम निभाया है, उसी प्रकार बैकुंठधाम भी इकठ्ठे ही चलें। श्री नरसिंह जी रविवार को और श्री सतगुरु देव जी सोमवार को परमधाम जाना चाहते थे। जब सतगुरू देव जी ने नरसिंह जी को सोमवार के दिन जाने को कहा तो वे बोले कि –हे गुरू महाराज यह हमारे आधीन नहीं है, हम रविवार शरीर त्याग देंगे, आप सोमवार आ जाना, लेकिन दोनों विमान सोमवार को इकठ्ठे ही चलें।

On reaching home, Shri Satgurudev Ji called his sister, Kamla's son, Shri Khan Chand Ji. After finding him consilient in all respects, Gurudev gave him the knowledge of Guruneeti and ceded him the holy Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. Then he took samadhi, gave up his life through Brahmdwar and departed for the ultimate abode.

रविवार की प्रातः नरसिंह जी शरीर त्याग कर परमधाम प्रस्थान कर गए। यह सुनते ही उनके सभी सेवक वहां आ गए। श्री सतगुरू देव जी भी वहां पहुंचे और उन्होंने कहा कि इन्हें अंतिम संस्कार के लिए कल ले जाना परन्तु उनके सेवक उसी दिन विमान सजा कर चलने लगे तभी भयानक आंधी आ गई और बिजली गिरने लगी। चारों तरफ अंधकार छा गया, किसी को कुछ नहीं सूझा। तब उन्हें समझ आ गया कि सतगुरू देव की इच्छा के विरुद्ध कुछ भी संभव नहीं है और उन्होंने उस दिन संस्कार करने का विचार छोड़ दिया।

Servitors of Shri Satgurudev Ji and Shri Narsinh Ji came there. All of them were awestruck and now realized the depth of their friendship. With profound grief, they picked up the piers for cremation. Shri Khan Chand Sahib Ji performed the last rites with vedic rituals.

सतगुरु देव श्री राजा राम साहिब जी, जो कि बाल ब्रह्मचारी थे, घर आकर उन्होंने अपनी बहन कमला के सुपुत्र श्री खान चन्द जी को बुलाया। उन्हें हर तरह से योग्य जानकर गुरुनीति का ज्ञान दिया और पावन गुरुगद्दी का तिलक लगाया। उसके बाद श्री सतगुरु देव जी ने समाधि लगा ली और ब्रह्मद्वार से अपने प्राणों का विर्सजन कर परमधाम को प्रस्थान कर गए। जब नरसिंह जी के सेवकों को यह खबर मिली तो वे अवाक रह गए और अब उन्हें दोनों की सच्ची मित्रता का एहसास हुआ। गहरे दुःख के साथ सभी सेवक दोनों विमानों को साथ-साथ लेकर चल पड़े और विधि अनुसार अंतिम क्रियाकर्म पूर्ण किए।

There is no limit of the glory of Satgurudev Shri Raja Ram Sahib Ji. Whosoever recites devotedly the holy virtues of Shri Satgurudev Ji, is absolved of all sins.

सतगुरु देव श्री राजा राम साहिब जी की लीला अपरम्पार है। उनके अत्यंत पावन गुणों का गायन करने से पापियों का उद्धार हो जाता है। जो कोई उनकी महिमा का गुणगान करता है उसके सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।