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Shri Kunj Bhawan Sahib Ji

श्री कुन्ज भवन साहिब जी

आगल गाथा सुनो मन लाई ।
    सतगुरु गाथा अति सुखदाई ।।
श्री कुन्जभवन साहिब सुखदाई ।
    गद्दी अटल अगाध सुहाई ।।

आगल गाथा सुनो मन लाई ।
    सतगुरु गाथा अति सुखदाई ।।
श्री कुन्जभवन साहिब सुखदाई ।
    गद्दी अटल अगाध सुहाई ।।

Shri Kunj Bhawan Sahib Ji

श्री कुन्ज भवन साहिब जी

Satgurudev Shri Kunjbhawan Sahib Ji was the Second Gurudev of the sacred Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. Always, living inside his premises, he worshipped all the time. People from far off places came to have a glimpse of his holy sight. They prayed to him to visit their houses, but he always refused because his father, Shri Harmilap Sahib Ji, had ordered him to stay inside for lifetime. Why Shri Harmilap Sahib Ji had ordered him to do so is also a quaint incident.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के द्वितीय गुरुदेव के रूप में विराजमान, सुखों की खान, सतगुरु देव श्री कुन्जभवन साहिब जी दिन-रात भवन के भीतर रहते एवं सतसंग करते। उनके स्थान पर सेवकों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से श्रद्धालु आकर उनके दर्शन करते और मनवांछित फल प्राप्त करते। जिस सेवक के घर में गुरूदेव का आगमन होता हैं वह धन्य हो जाता है लेकिन सतगुरू देव जी पिता जी की आज्ञा के कारण सेवकों के बार बार बुलाने पर भी उनके घर न जाते, वे सदा भवन में ही रहते। उन्हें यह आज्ञा क्यों दी गई , यह भी सतगुरू देव की एक न्यारी बाललीला है।

When Shri Kunjbhawan Sahib Ji was twelve years old, one day he went to play with his friends. He was the naughtiest of them all. One day he climbed up a wall and said - "Run my horse! Run!" He pretended to be riding a horse, while sitting astride on the wall as if he wanted to put life in it and make it gallop like a horse. In the meantime, a Muslim saint came there and was fascinated to see this child. He wanted to know more about him. Though curious, he could not stop himself from crying harshly that it was a lifeless wall and not a horse, who would run on his command. On hearing this, Shri Kunjbhawan Sahib Ji got angry and said – “Do you think that I am just a child? The five non-living elements - Water, Air, Fire, Earth and Sky - are ubiquitous but life is present in all of them; the one, who keeps eighty-four lakh creatures at his behest, is the ‘Me’, who has come to this world.

श्री कुन्जभवन साहिब जी का बचपन का नाम श्री कुन्ज बिहारी जी था। वे जब बारह वर्ष की आयु के थे तो एक दिन अपने मित्रों के साथ खेलने के लिए गए। वे सभी मित्रों में, सबसे अधिक नटखट थे। खेल खेल में वे एक दीवार पर चढ़ गए और दीवार को पैर मार कर कहने लगे कि – चल मेरी घोडी चल, यह कहकर वे उस जड़ दीवार को चेतन कर, उसे घोडी की तरह सरपट दौड़ाना चाहते थे।

Then what is the power of this wall against me?” He then kicked the wall and patted it as if it were a horse. Amazingly, the wall started running. After some distance, Shri Kunjbhawan Sahib Ji patted it to stop and it stopped. The Muslim saint was dumbstruck and afraid at the same time. He fell at Shri Kunjbhawan Sahib Ji's feet and asked to forgive him. All his doubts were cleared. Gurudev blessed him and he went away, after that.

इतने में वहां एक मुसलमान फकीर आ गया, जैसे ही उसने बालरुप श्री कुन्ज बिहारी जी की सुंदर छवि के दर्शन किए, वह मंत्रमुग्ध हो गया और सोचने लगा कि- अत्यंत तेजस्वी और प्रिय लगने वाले इस बालक को कैसे पहचानूं कि यह कौन है। अपनी उत्सुकतावश हृदय में प्रेम भरकर वह उतेजना भरे वचन बोला - तुम तो अभी बालक हो, तुम भला ईश्वर की अदृश्य शक्ति को क्या जानो। यह घोडी नहीं जो तुम्हारे चलाने से चल जाएगी, निर्जीव दीवार में जीवन कहां से आएगा अतः शोर मत करो और भाग जाओ।

The children told everyone about the miracle done by Shri Kunjbhawan Sahib Ji. A huge crowd gathered at the Darbar to get a divine glimpse of Shri Kunjbhawan Sahib Ji. When Satgurudev Shri Harmilap Sahib Ji came to know about the act done by his son, he called him and said angrily that he had committed the blunder to show a miracle, unnecessarily. He ordered him to give up his life immediately. People started crying. They begged Shri Harmilap Sahib Ji that this child should not be punished. They repeatedly beseeched to take back his curse. Shri Harmilap Sahib Ji accepted their prayer and instead ordered Shri Kunjbhawan Sahib Ji to stay inside the house, all his life. Shri Kunjbhawan Ji obeyed the order of his father and confined himself indoors. His name was ‘Kunjbihari’ but because of always staying indoors, he was now known as ‘Kunjbhawan’.

यह सुनकर बालरुप श्री कुन्ज बिहारी जी को आवेश आ गया और बोले – तुमने क्या हमें केवल बालक ही समझा है। हर तरफ पांच निर्जीव तत्वों – जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश का फैलाव है लेकिन उसमें भी जीवन उजागर हो रहा है और चौरासी लाख योनियों को जो नाच नचा रहा है, वही ‘हम’ इस संसार में आए है, तो फिर इस बेचारी दीवार की क्या हस्ती है। इतना कहते ही श्री कुन्ज बिहारी जी ने जोर से उस दीवार को दोनों एडियां मारी तथा करकमलों से ऐसे थापी लगाई जैसे कि घोडी को लगाई जाती है। बस फिर क्या था, निर्जीव दीवार में जान आ गई और वह चलने लगी। दीवार एक योजन (चार कोस) तक चली, फिर श्री कुन्ज बिहारी जी ने उस दीवार को प्यार से पुचकारा और वह सिंधु दरिया के किनारे जाकर रुक गई। वे प्रसन्नतापूर्वक नीचे उतर आए।

Shri Satgurudev Ji complied with the command of his father and spent eighty years of his life indoors following rigorous self-control, temperance and austerity. One day he called his son Shri Raja Ram Ji and explained to him the Guruneeti and handed over the pious Shri Harmilap Gaddi to him. He told him that his strict pledge had been completed and attained and he wanted to go to Param Dham. Satgurudev Shri Kunjbhawan Sahib Ji then went into trance, gave up his vital breath through Brahmdwar and moved on to heaven.

वह फकीर भी पीछे पीछे भागता हुआ वहां पहुंच गया। उसकी आंखें अश्रुपूरित हो गई। बालरूप श्री कुन्ज बिहारी जी की इस लीला को देखकर वह हैरान और भयभीत हो गया एवं उनके चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगा और बोला कि - आपके प्रति मेरा सारा संदेह दूर हो गया है। मेरे द्वारा बोले गए उत्तेजक शब्दो को हृदय में मत रखना, मैं आपकी शरणागत हूँ। तब श्री कुन्ज बिहारी जी ने उसके सिर पर अपना हाथ रखकर उसका भाग्य उज्ज्वल कर दिया और वह फकीर उनसे आशीर्वाद पाने के बाद वहां से चला गया।

सभी बालकों ने बालरूप श्री कुन्ज बिहारी जी द्वारा अपनी दिव्य शक्ति से दीवार दौड़ाने वाली बात सबको बता दी। सभी नगरवासी सतगुरु देव श्री हरमिलाप साहिब जी के दरबार पर इकट्ठे हो गए। जब श्री हरमिलाप साहिब जी को पुत्र द्वारा की गई बाललीला का पता चला तो उन्होंने उसे बुलाया और पूछा कि –क्या यह सच है, इस पर वह मौन ही रहे। तब श्री हरमिलाप साहिब जी ने व्यथित हृदय से कहा- तुमने व्यर्थ में चमत्कार दिखाकर बहुत बड़ी भूल की है। तुम्हें अब इस संसार में रहने का अधिकार नहीं है, इसी समय अपने प्राणों का त्याग करो। यह सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग हाहाकार करने लगे। वे श्री हरमिलाप साहिब जी के चरणों को पकड़ कर प्रार्थना करने लगे कि – बालक की बुद्धि तो अंजान व चंचल स्वभाव की होती है। आप इसके लिए इतनी बड़ी सजा न दे और आपने जो आज्ञा दी है उसे वापस ले लें। श्री हरमिलाप साहिब जी ने सब सेवकों की प्रार्थना तो स्वीकार कर ली परन्तु श्री कुन्ज बिहारी साहिब जी को जीवन पर्यन्त भवन के अंदर रहने की आज्ञा दी। इस तरह पिता जी की आज्ञा के अनुसार श्री कुन्ज बिहारी साहिब जी सदा भवन के भीतर ही रहने लगे। जीवन पर्यन्त भवन के भीतर रहने के कारण वे ‘श्री कुन्जभवन’ कहलाने लगे।

जैसे-जैसे श्री कुन्ज भवन साहिब जी भवन में रहते हुए जप, तप व संयम करते रहे, वैसे-वैसे उनका तेज अत्यधिक होता गया। भिन्न भिन्न प्रांतो से सेवक, श्रद्धालु व प्रेमी दर्शन के लिए आते और मनवांछित फल पाते। इस प्रकार मंगल कार्यों में कई वर्ष बीत गए। एक दिन सतगुरु देव श्री कुन्ज भवन साहिब जी ने अपने सुपुत्र श्री राजा राम जी को अपने पास बुलाया। उन्हें गुरुनीति समझाई और हर तरह से योग्य जानकर पावन गुरुगद्दी पर विराजमान किया। फिर उन्होंने श्री राजा राम साहिब जी से कहा - मेरा बहुत ही कठोर प्रण पूरा हो गया है औंर अब हमारा परमधाम जाने का समय आ गया है। तुम सदा हृदय में श्री हरमिलाप साहिब जी के नाम का सुमिरन करना, गुरु और शिष्य का नाता पिता और पुत्र समान होता है अतः आपका धर्म है कि सेवकों के सभी कष्टों का निवारण करना। उसके बाद सतगुरु देव श्री कुन्जभवन साहिब जी ने समाधि लगा ली और दसवें द्वार से प्राणों का विसर्जन कर सत्यलोक को गमन किया।

अत्यंत धैर्यवान सतगुरु देव श्री कुन्ज भवन साहिब जी ने पिता जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर अत्यंत कठोर प्रण का पालन किया जो सभी सेवकों के लिए प्ररेणा स्त्रोत है। हे आनंद की खान! हे अत्यंत गुणों वाले! हे करूणानिधान! जो कोई भी आपकी महिमा का गुणगान करता है, वह बिना प्रयास के ही भवसागर से पार हो जाता है।