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Shri Harmilap Sahib Ji

श्री हरमिलाप साहिब जी

गाथा श्री हरमिलाप साहिब की, प्रारंभ करूं कर जोर ।
     जिन का यश गायन किए, मंगल होय चहुं ओर ।।

गाथा श्री हरमिलाप साहिब की, प्रारंभ करूं कर जोर । जिन का यश गायन किए, मंगल होय चहुं ओर ।।

Shri Harmilap Sahib Ji

श्री हरमिलाप साहिब जी

In the city of Ghazni, Afghanistan, there lived a merchant who was religious and discerning. He was almost fifty but he did not have a child. He was a God fearing man who always prayed to God and served the saints with reverence. Pleased with his devoutness, God blessed him with a son. His joy knew no bounds. Then one day he called a priest for naming the child. One glimpse of the child, and priest predicted that this child was not an ordinary but a divine child, who would start a cult to absolve the people of Kaliyuga from their sins. The priest named the angelic child 'Milawa Ram'.

अफगानिस्तान के गजनी नामक शहर में एक व्यापारी परिवार निवास करता था । दोनों पति पत्नी बहुत गुणवान तथा धर्म का पालन करने वाले थे। पचास वर्ष की आयु बीत जाने पर भी उनके घर में संतान न हुई । वे ईश्वर से प्रार्थना करते एवं श्रद्धापूर्वक संत महात्माओं की सेवा करते। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उनको एक पुत्र रत्न प्रदान किया। पुत्र पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए जिसके नामकरण संस्कार के लिए उन्होंने एक पुरोहित को बुलवाया। बालक को देखते ही अचंभित होकर पुरोहित ने कहा – यह कोई साधारण बालक नहीं अपितु एक दिव्य बालक हैं जो एक पंथ को चलाएगे और इनसे कलयुग के प्राणी बहुत सुख पांएगे। जो भी इनकी शारण में आएगा, ये उसे परमात्मा से मिला दिया करेंगें इसलिए इस बालक का नाम ‘मिलावा राम’ रखते हैं ।

The child started learning at the age of five and in a very short span, he had acquired a considerable amount of knowledge. When he was young, his father opened a shop for him. Though he took to working there but his mind was always besotted by recitations of ‘Naam’ and he regularly went in the coterie of saints. On observing his inclination towards spirituality, one of his friends asked why he had not taken an initiation from a guru, since one cannot attain the real knowledge without a mentor. After listening to his friend, an urge to find a Satguru came to his mind and leaving behind everything, he started his journey to find his ‘guru’, where many people accompanied him.

तेजस्वी बालक ने पांच वर्ष की आयु में विद्याध्ययन आरंभ किया और थोड़े ही समय में समपूर्ण विद्या ग्रहण कर ली। जब वे युवावस्था के हुए तो पिता जी ने उन्हें एक दुकान खोल दी। वे दुकान पर काम तो करते परंतु उनका मन सदैव प्रभु सिमरन में लगा रहता। वे नित्यप्रति साधुओं की संगत में जाते। आध्यात्मिकता की ओर उनका झुकाव देखकर एक दिन उनके एक मित्र ने कहा – गुरु के बिना कभी किसी को ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तुमने अभी तक गुरु धारण क्यों नहीं किया। मित्र की बात सुनकर मिलावा राम जी के मन में ‘सतगुरु’ को पाने की तीव्र इच्छा जागी और सब कुछ भूलाकर वे ‘गुरु’ की खोज में निकल पड़े।

During their course, they reached the state of Punjab. Through a spiritual discourse, Milawa Ram Ji met Hariya Ji who took him to his Gurudev Gosain Ramkrishan Ji Maharaj. Gosain Ji was stunned on seeing the persona of Milawa Ram Ji. After finding him apposite, Gosain Ji blessed him with guru mantra and renamed him 'Harmilap Sahib'. He blessed him with immortal graces and an everlasting Gaddi. He also said that whosoever will recite ‘his’ name, would obtain all the four substances - Dharma, Artha, Kama and Moksha.

वे पंजाब राज्य में पहुंच गए। सत्संग के माध्यम से मिलावा राम जी की भेंट एक योगी, हरिया जी, से हुई। हरिया जी उन्हें अपने गुरुदेव गोसाईं रामकृष्ण जी महाराज के पास ले आए। गोसाईं जी, मिलावा राम जी की सुंदर छवि देखकर चकित रह गए। उनके तेजस्वी रुप को देखकर व हर प्रकार से योग्य जानकर गोसाईं जी ने उन्हें गुरुमंत्र दिया और उनका नाम ‘हरमिलाप साहिब’ रखा एवं साथ ही उन्हें अटल व चिरस्थायी गद्दी का आशीर्वाद दिया और कहा कि – जो कोई भी तुम्हारे नाम का सुमिरन करेगा, उसको संसार के चारों पदार्थ – धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष – प्राप्त हो जाएंगे।

After receiving the assent of his Gurudev, Shri Harmilap Sahib Ji returned to Ghazni. Hence, the pious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji was commenced with Shri Harmilap Sahib Ji as its First Gurudev. Everyone in Ghazni came to know that Shri Milawa Ram Ji has now become the purna Satguru. His authority as a ‘guru’ spread everywhere. People from miles around started coming to him. Getting a divine glimpse of Shri Satgurudev Ji, they felt blessed. The hermitage of Shri Harmilap Sahib Ji became famous for conferring happiness to each and everyone.

उसके बाद सतगुरू देव श्री हरमिलाप साहिब जी गोसाईं रामकृष्ण जी से आज्ञा लेकर गजनी वापस आ गए। इस प्रकार पावन श्री हरमिलाप गद्दी का प्रारंभ हुआ जिसके प्रथम गुरुदेव श्री हरमिलाप साहिब जी थे। गजनी में हर कोई यह जान गया कि मिलावा राम जी अब ‘पूर्ण सतगुरु’ बन गए हैं। दूर-दूर से लोग आने लगे एवं श्री सतगुरु देव जी की दिव्य झलक पाकर वे अपने आप को धन्य समझते। श्री सतगुरु देव जी का आश्रम समस्त सुमंगलों की खान बन गया। वहां पर सतगुरु देव श्री हरमिलाप साहिब जी के दो सेवक थे – कंवलापत और ग्वाल। गुरु दरबार की सेवा करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। श्री सतगुरु देव जी की उन पर विशेष कृपा थी। एक दिन श्री सतगुरु देव जी ने गन्ना खाकर उसका छिलका नीचे गिरा दिया। ग्वाल ने उस छिलके को उठाकर अपने मुंह में डाल लिया। ऐसा करते ही उसके अंतःकरण के सब द्वार खुल गए। ग्वाल के मुख पर तेज चमकने लगा और उसे दिव्य शक्ति की प्राप्ति हो गई।

Two devotees of Shri Harmilap Sahib Ji, named Kanwlapat and Gwal, lived with him. The only purpose of their lives was to serve Shri Satgurudev Ji. They stood at his service all the time and moved at his behest. Shri Satgurudev Ji treated them like his own sons. One day, Gurudev had eaten a sugarcane and dropped the cane rind. Gwal picked the cane rind and put it in his mouth. Suddenly, there occurred a miracle. His face started glowing and he attained the divine power.

कुछ समय तक गजनी में रहने के बाद श्री सतगुरु देव जी डेरा इस्माईल खान आ गए। वे कंवलापत को अपने साथ ले आए तथा ग्वाल को गजनी में आश्रम की सेवा के लिए ठहरा दिया। ग्वाल वहां ठहर तो गया परंतु हर समय उदास रहने लगा। उसे श्री सतगुरु देव जी का विछोह सहना कठिन लग रहा था। कुछ समय उपरान्त एक बालक के साथ ग्वाल की गहरी मित्रता हो गई। अकस्मात बालक को कोई रोग हुआ और उसकी मृत्यु हो गई। उसके मोहवश ग्वाल ने श्री सतगुरु जी द्वारा प्रदत दिव्य शक्ति का दुरूपयोग कर बालक को जीवित कर दिया। सभी इस अलौकिक घटना को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

After living at Ghazni for some years, Shri Satgurudev Ji came to Dera Ismail Khan. He took Kanwlapat with him and assigned the service of his hermitage to Gwal, in Ghazni. Gwal stayed there but remained pensive all the time. He was finding it difficult to forebear the separation of Shri Satgurudev Ji. Moreover, he had a very close friendship with a boy who suddenly died one day. Gwal could not endure this. He used his divine power and brought his friend back to life. Everyone was surprised at this uncanny incident.

अंतर्यामी श्री सतगुरु देव जी ग्वाल की इस करतूत को जान गए और उन्होंने उसे दी हुई दिव्यशक्ति वापस खींच ली। ग्वाल के मुख की चमक एकदम लुप्त हो गई और उसके हृदय में अंधकार छा गया। वह समझ गया कि उसने दिव्यशक्ति का दुरूपयोग करने की भूल की है। वह सुध-बुध भूल गया और प्रायशिचत करने हेतु श्री सतगुरु देव जी के दर्शन करने के लिए चल पड़ा।

When Shri Satgurudev Ji came to know about Gwal's deed, he withdrew all the divine power from him. The glow on Gwal's face disappeared immediately and his heart was filled with deep darkness. Gwal realized that he had done the mistake of misusing the divine power. He became unconscious and left for the darshan of Shri Satgurudev Ji.

उधर श्री सतगुरु देव जी ने कंवलापत को ग्वाल द्वारा बालक को जीवित करने की सारी घटना बता दी और कहा कि – ग्वाल हमारे स्थान पर आ रहा है। उससे कहना कि – जो परमात्मा की इच्छा के विपरीत चलता है, वह मेरे दर्शन भी पाने के योग्य नहीं है। वह जिस रास्ते से आया है, उसी से वापस चला जाए। कंवलापत को समझाने के बाद श्री सतगुरु देव जी चौबारे चले गए और उन्होंने किवाड़ बंद करके समाधि लगा ली।

Shri Satgurudev Ji called Kanwlapat and told him that Gwal was coming there. Gurudev narrated him Gwal's misdeed and said, “One who goes against the wish of God does not deserve my darshan.” Then he instructed Kanwlapat not to allow Gwal to come to him. Thereafter, Gurudev went to a small room upstairs, bolted the door from inside and took samadhi.

ग्वाल प्रातः श्री सतगुरु देव जी के दरबार पर पहुंच गया। उसने द्वार पर दंडवत प्रणाम किया और गुरुदरबार की पवित्र धूलि माथे पर लगाई। कंवलापत को सोते देखकर वह उसे जगाने लगा। ग्वाल की आवाज सुनकर कंवलापत जाग गया। उसने ग्वाल से कहा – श्री सतगुरु देव जी के प्रति प्रेम छोडकर तुमने किसी अन्य से मित्रता कर ली । श्री सतगुरु देव जी ने तुम्हें दिव्यशक्ति दी थी, तुमने उसका मह्त्व नहीं जाना एवं एक बालक के मोहवश उनके द्वारा प्रदत शक्तियों का दुरुपयोग किया अतः जहां से आए हो, वहीं वापस चले जाओ तुम्हें श्री सतगुरु देव जी के दर्शन नहीं होंगे।

In the morning, Gwal reached the Darbar of Shri Satgurudev Ji. He laid himself in reverence at the door and applied the pious dust on his forehead. When he found Kanwlapat asleep, he tried to wake him up. Hearing Gwal's voice, Kanwlapat woke up. He got angry on seeing him there. He said that Shri Satgurudev Ji had given him the divine power but he did not realize its value. He admonished him for that and said that over his love for the Gurudev, he loved someone else. Therefore, Gurudev had denied him of his darshan. Kanwlapat told him to go away from there.

कंवलापत के कठोर शब्द सुनकर ग्वाल बहुत दुखी हो गया और विलाप करते हुए कहने लगा कि श्री सतगुरु देव जी के बिना जीने की अब मुझे कोई इच्छा नहीं है। रोते-रोते वह नीचे गिर गया और तड़पने लगा। उसकी यह दशा देखकर कंवलापत ने डरते हुए दरवाजा खोल दिया और कहा – श्री सतगुरु देव जी चौबारे में बैठे हैं जाकर क्षमा याचना कर लो।

Gwal was shattered on hearing this. He started weeping and lamenting that he did not have any desire to live without Shri Satgurudev Ji. He was in severe distress. Seeing him in such a state, Kanwlapat allowed him to go upstairs. There were twenty-six steps to the room where Shri Harmilap Sahib Ji was meditating. Praying and seeking apologies from His Holiness, Satgurudev Shri Harmilap Sahib Ji, Gwal started climbing step by step and reached near the room. He knocked at the door and apologized repeatedly, but Shri Harmilap Sahib Ji did not open the door. Severely traumatized by this, Gwal came down and gave up his life.

धीरज रखते हुए ग्वाल तब उठ खड़ा हुआ। परमपावन सतगुरु देव श्री हरमिलाप साहिब जी से विनय करते हुए, उनकी स्तुति करते हुए तथा उनसे क्षमायाचना करते हुए एक-एक सीढ़ी चढते हुए , ग्वाल 26 पौढियां चढ कर चौबारे पहुंच गया। चौबारे पर पहुंच कर उसने किवाड़ खटखटाया, बार-बार क्षमायाचना की परंतु श्री सतगुरु देव जी के दर्शन न पा सका। ग्वाल को गहरा आघात लगा। वह विलाप करता हुआ चौबारे से नीचे उतर आया। उसने तड़पते- कलपते हुए प्राण त्याग दिए।

Shri Satgurudev Ji could not withstand that Gwal had given up the life owing to his separation, so he brought him back to life. Gurudev also did what Gwal had done to his friend. Because going against God's will is not justified, Gurudev decided to go to Satyaloka. He called his son Shri Kunjbhawan Sahib Ji and handed him over the sacred Gaddi in vedic way. Next morning, Gurudev took Padmasana, gave up his vital breath and went to Satyaloka. Unable to bear the bereavement of Shri Satgurudev Ji, Kanwlapat and Gwal also gave up their lives.

अंतर्यामी श्री सतगुरु देव जी यह जान गए कि ग्वाल ने उनके विछोह में प्राण त्याग दिए हैं। उन्होंने अपनी अंर्तनिहित शक्तियों से ग्वाल को जीवित कर दिया और कहा कि जिस अपराध के कारण तुमने सजा पाई, परिस्थितिवश वही कार्य हमने भी कर दिया है इस वजह से अब हमने बैकुंठ धाम जाने का निश्चय किया है क्योंकि परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध चलना अनुचित है। तत्पश्चात उन्होंने अपने पुत्र श्री कुन्जभवन जी को बुलाया, उन्हें गुरुनीति समझाकर और शास्त्र विधि से गुरुगद्दी पर विराजमान किया और अगले दिन प्रातः पदमासन लगाकर ब्रह्मलोक को गमन किया। ग्वाल भगत तथा कंवलापत श्री सतगुरु देव जी का विछोह सहन नहीं कर सके और उन दोनों ने भी प्राण त्याग दिए।

When people came to know of this, their hearts were filled with sorrow. Shri Kunjbhawan Sahib Ji explained to them to endure and not to grieve for those who have left for Satyaloka. He religiously performed all the last rites. Suddenly a light spread and people saw a chariot in which Shri Narayan Ji appeared to be sitting. But, the chariot disappeared in a moment. All the people present there were stunned.

श्री सतगुरु देव जी के परमधाम जाने की खबर सुनते ही सभी बहुत दुखी हो गए। श्री कुन्जभवन साहिब जी ने उन्हें धैर्य देते हुए समझाया कि जो ब्रह्मलीन हो गए हैं उनके लिए शोक न करो , फिर वेद विधि के अनुसार अंतिम संस्कार किया। उसी समय चारों तरफ एक प्रकाश फैल गया और लोगों को एक विमान दिखाई दिया जिसमें श्री नारायण जी बैठे हुए नजर आए। कुछ ही क्षणों में वह विमान आंखों से ओझल हो गया। सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।

After that, the eminence of Shri Harmilap Sahib Ji spread all over the world. Hence, even today the one who recites his ‘Naam’, all his wishes are fulfilled.

श्री हरमिलाप साहिब जी की प्रसिद्धि सारे संसार में व्याप्त है, जो कोई भी उनके नाम का जाप करता है, उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।