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Nitya Leelaleen 1008 Shri Muni

Harmilapi Ji Maharaj Ji

Harmilapi Ban Ke Tu Dunia Me Sada Gujran Kar,
Dil Kisi Ka Mat Dukha, Tu Har me Hari Ki Pahchan Kar...

Shri Harmilap Mission  a brief history

श्री हरमिलाप पावन गद्दी  संक्षिप्त विवरण

In the city of Ghazni, Afghanistan, there lived a merchant who was religious and discerning. He was almost fifty but he did not have a child. He was a God fearing man who always prayed to God and served the saints with reverence. Pleased with his devoutness, God blessed him with a son. His joy knew no bounds. Then one day he called a priest for naming the child. One glimpse of the child, and priest predicted that this child was not an ordinary but a divine child, who would start a cult to absolve the people of Kaliyuga from their sins. The priest named the angelic child 'Milawa Ram'.

पावन श्री हरमिलाप गद्दी का प्रारंभ प्रथम गुरूदेव सत् श्री हरमिलाप साहिब जी ने संवत 1577 में गजनी अफगानिस्तान में किया, जिन्हें उनके गुरुदेव गोसांई श्री रामकृष्ण गिरि जी महाराज ने अमिट गौरव तथा अटल व चिरस्थाई गद्दी का आशीर्वाद प्रदान किया था। यह एक सच्ची व सुच्ची गद्दी है। सभी साहिबान सूर्य के समान स्वयं प्रकाशित हैं और विश्व में फैले पाप रूपी अंधेरे को दूर कर रहे हैं। वे सर्वशक्तिमान, तेजस्वी, ओजस्वी, प्रतापी एवं धर्मपरायणता में प्रवीण रहे हैं। समय-समय पर इस गौरवमयी गद्दी के सभी साहिबों ने मसीहा बनकर समाज को संकट से उबारा और नगर-नगर, गांव-गांव में जाकर श्री हरमिलाप साहिब जी के आदेश, उपदेश व संदेशों का प्रचार किया। गजनी से श्री हरमिलाप साहिब जी डेरा इस्माईल खान, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान में है, में आ गए और वहीं पर अपना स्थान बना लिया। श्री हरमिलाप गद्दी के साहिबों को बुच्चाकलां नामक स्थान बहुत भाया और दूसरी महत्वपूर्ण शाखा बुच्चाकलां में स्थापित हुई।

The child started learning at the age of five and in a very short span, he had acquired a considerable amount of knowledge. When he was young, his father opened a shop for him. Though he took to working there but his mind was always besotted by recitations of ‘Naam’ and he regularly went in the coterie of saints. On observing his inclination towards spirituality, one of his friends asked why he had not taken an initiation from a guru, since one cannot attain the real knowledge without a mentor. After listening to his friend, an urge to find a Satguru came to his mind and leaving behind everything, he started his journey to find his ‘guru’, where many people accompanied him.

इस पावन गद्दी के ग्यारहवें गुरुदेव श्री मुनि हरमिलापी जी महाराज विभाजन से पूर्व हरिद्वार आ गए और वहां पर मिशन के प्रमुख स्थान श्री हरमिलाप भवन की स्थापना की। भवन के मध्य में बने मंदिर में गोसाईं रामकृष्ण जी, श्री हरमिलाप साहिब जी तथा श्री राधा कृष्ण जी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं एवं पाकिस्तान से लाए गए पूज्य साहिबों के समाधि कलश स्थापित हैं। श्री मुनि हरमिलापी जी महाराज ने श्री हरमिलाप मिशन के ध्वज को संपूर्ण विश्व में फहरा दिया। उनका यह मूल मंत्र आज जन-जन के मन को हर्षा रहा है -

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Do not allow any incidence to affect the mind so that you are carried away by its consequent joy or sorrow. Always contemplate, I am immortal... I am eternal… I am not born nor am I subject to death… I am the untouched Self…’ Live your life with this firm resolve. Constantly contemplate upon these thoughts and be engrossed therein at all times. किसी भी प्रसंग को मन में लाकर हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना | ‘मैं अजर हूँ…, अमर हूँ…, मेरा जन्म नहीं…, मेरी मृत्यु नहीं…, मैं निर्लिप्त आत्मा हूँ…’ यह भाव दृढ़ता से हृदय में धारण करके जीवन जीयो | इसी भाव का निरंतर सेवन करो | इसीमें सदा तल्लीन रहो |
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Do not allow any incidence to affect the mind so that you are carried away by its consequent joy or sorrow. Always contemplate, I am immortal... I am eternal… I am not born nor am I subject to death… I am the untouched Self…’ Live your life with this firm resolve. Constantly contemplate upon these thoughts and be engrossed therein at all times.ss किसी भी प्रसंग को मन में लाकर हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना | ‘मैं अजर हूँ…, अमर हूँ…, मेरा जन्म नहीं…, मेरी मृत्यु नहीं…, मैं निर्लिप्त आत्मा हूँ…’ यह भाव दृढ़ता से हृदय में धारण करके जीवन जीयो | इसी भाव का निरंतर सेवन करो | इसीमें सदा तल्लीन रहो |

Guru Sahebaan

गुरु साहेबान

1st Gurudev प्रथम गुरुदेव
Shri Harmilap Sahib Ji श्री हरमिलाप साहिब जी

In the city of Ghazni, Afghanistan, there lived a merchant who was religious and discerning. He was almost fifty but he did not have a child. He was a God fearing man who always prayed to God and served the saints with reverence. Pleased with his devoutness, God blessed him with a son. His joy knew no bounds. Then one day he called a priest for naming the child. One glimpse of the child, and priest predicted that this child was not an ordinary but a divine child, who would start a cult to absolve the people of Kaliyuga from their sins. The priest named the angelic child 'Milawa Ram'.

अफगानिस्तान के गजनी नामक शहर में एक व्यापारी परिवार निवास करता था । दोनों पति पत्नी बहुत गुणवान तथा धर्म का पालन करने वाले थे। पचास वर्ष की आयु बीत जाने पर भी उनके घर में संतान न हुई । वे ईश्वर से प्रार्थना करते एवं श्रद्धापूर्वक संत महात्माओं की सेवा करते। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उनको एक पुत्र रत्न प्रदान किया। पुत्र पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए जिसके नामकरण संस्कार के लिए उन्होंने एक पुरोहित को बुलवाया। बालक को देखते ही अचंभित होकर पुरोहित ने कहा – यह कोई साधारण बालक नहीं अपितु एक दिव्य बालक हैं जो एक पंथ को चलाएगे और इनसे कलयुग के प्राणी बहुत सुख पांएगे। जो भी इनकी शारण में आएगा, ये उसे परमात्मा से मिला दिया करेंगें इसलिए इस बालक का नाम ‘मिलावा राम’ रखते हैं ।

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2nd Gurudev द्वितीय गुरुदेव
Shri Kunj Bhawan Sahib Ji श्री कुन्ज भवन साहिब जी

Satgurudev Shri Kunjbhawan Sahib Ji was the Second Gurudev of the sacred Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. Always, living inside his premises, he worshipped all the time. People from far off places came to have a glimpse of his holy sight. They prayed to him to visit their houses, but he always refused because his father, Shri Harmilap Sahib Ji, had ordered him to stay inside for lifetime. Why Shri Harmilap Sahib Ji had ordered him to do so is also a quaint incident.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के द्वितीय गुरुदेव के रूप में विराजमान, सुखों की खान, सतगुरु देव श्री कुन्जभवन साहिब जी दिन-रात भवन के भीतर रहते एवं सतसंग करते। उनके स्थान पर सेवकों की भीड़ लगी रहती। दूर-दूर से श्रद्धालु आकर उनके दर्शन करते और मनवांछित फल प्राप्त करते। जिस सेवक के घर में गुरूदेव का आगमन होता हैं वह धन्य हो जाता है लेकिन सतगुरू देव जी पिता जी की आज्ञा के कारण सेवकों के बार बार बुलाने पर भी उनके घर न जाते, वे सदा भवन में ही रहते। उन्हें यह आज्ञा क्यों दी गई , यह भी सतगुरू देव की एक न्यारी बाललीला है।

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3rd Gurudev तृतीय गुरुदेव
Shri Raja Ram Sahib Ji श्री राजा राम साहिब जी

Satgurudev Shri Raja Ram Sahib Ji was the Third Gurudev of the pious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He had entered the mortal world for the well being of his devotees. He had many followers in various parts of the country. One day, a follower from Ghazni came and presented him a beautiful skewbald horse. Riding on this horse, Shri Satgurudev Ji visited different places tending to welfare of the people.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर विराजमान तृतीय सतगुरु देव, बाल ब्रह्मचारी श्री राजा राम साहिब जी भक्तों के हित के लिए अवतार लेकर आए। देश के विभिन्न प्रांतों से सेवक , श्रद्धालु व प्रेमी आकर उनके दर्शन करते और श्री सतगुरू देव उनके सभी कष्टों का निवारण करते। एक बार गजनी से एक सेवक उनके दर्शन के लिए आया। उसने श्री सतगुरु देव जी को एक चितकबरा घोड़ा भेंट किया जिस पर सवार होकर श्री सतगुरु देव जी सेवकों के कल्याण के लिए सब जगह जाते।

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4th Gurudev चतुर्थ गुरुदेव
Shri Khan Chand Sahib Ji श्री खान चन्द साहिब जी

Satgurudev Shri Khan Chand Sahib Ji was the Fourth Gurudev of the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He was a noble hearted, sympathetic and truely divine in all respects. His aura was always shining like the sun. People from far off places came for a mere glimpse of his divine presence. Shri Satgurudev Ji blessed them and lifted their sufferings.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के चतुर्थ सतगुरु देव श्री खान चन्द साहिब जी अत्यंत दयालु, हर प्रकार से परिपूर्ण, सुखों के भंडार एवं सूर्य के समान तेजस्वी हैं। दूर-दूर से सेवक श्रद्धालु व प्रेमी उनके दर्शन के लिए आते। श्री सतगुरु देव जी उन्हें आशीर्वाद देकर उनके सभी प्रकार के दैहिक, दैविक व मानसिक तापों को दूर कर देते और उन्हें किसी भी प्रकार का दुःख एवं दरिद्रता न रहती।

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5th Gurudev पंचम गुरुदेव
Shri Bhavani Das Sahib Ji श्री भवानी दास साहिब जी

Satgurudev Shri Bhawani Das Sahib Ji was the Fifth Gurudev of the sacrosanct Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His extremely lenient approach brought him closer to his worshippers. He abhorred shrewdness and deceit. He loved people with a pure heart and had a courteous nature. An illuminated aura and pure bliss prevailed around him.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के पंचम सतगुरु देव श्री भवानी दास साहिब जी महाराज अंतर्यामी, घट-घट वासी तथा सुखों के भंडार हैं। उनकी अत्यंत सुंदर छवि भक्तों के मन को मोह लेती। सारे संसार के आधार श्री सतगुरु देव जी को सेवक अपने पुत्र के समान प्रिय लगते। दूर दूर से सेवक, श्रद्धालु व प्रेमी उनके दर्शन के लिए आते एवं मनवांछित फल पाते।

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6th Gurudev षष्टम गुरूदेव
Shri Chandra Bhan Sahib Ji श्री चन्द्र भान साहिब जी

Satgurudev Shri Chandrabhan Sahib Ji was the Sixth Gurudev of the pious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. As was his name, so were his attributes. His temperament was as calm as that of the moon and the glow of his aura was as bright as that of the sun. His holy sight and touch had the power to destroy the sins of his worshippers.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर षष्टम गुरुदेव के रूप में सतगुरु देव श्री चन्द्रभान साहिब जी विराजमान हुए। नाम के अनुरूप ही उनमें गुण विद्यमान रहे। उनका स्वभाव चंद्रमा के समान शीतल तथा मुखमंडल पर सूर्य के समान तेज रहता। उनके दर्शन एवं चरण स्पर्श मात्र से ही भक्तों का कल्याण हो जाता।

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7th Gurudev सप्तम् गुरुदेव
Shri Chaman Lal Sahib Ji श्री चमन लाल साहिब जी

Satgurudev Shri Chaman Lal Sahib Ji was the Seventh Gurudev of the glorious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His aura was as bright as the sun. He loved his devotees and freed them from their sufferings. He was always surrounded by his followers, at his Darbar.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी पर सप्तम गुरुदेव के रूप में विराजमान सतगुरु देव श्री चमन लाल साहिब जी के मुखमंडल पर सूर्य के समान तेज सुहाता। वे अपने सेवकों से अत्यधिक प्रेम करते और उनके कष्टों का निवारण करते। उनके दरबार में सदा ही सेवको की भीड़ लगी रहती।

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8th Gurudev अष्टम् गुरुदेव
Shri Jagdish Lal Sahib Ji श्री जगदीश लाल साहिब जी

Satgurudev Shri Jagdish Lal Sahib Ji was the Eighth Gurudev of the resplendent Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. His kindness was instrumental in removing the sufferings of his devotees.

श्री हरमिलाप पावन गद्दी के अष्टम गुरुदेव के रुप में सतगुरु देव श्री जगदीश लाल साहिब जी भक्तों के हित के लिए अवतार ले कर आए और कल्प वृक्ष के समान, उनके सानिध्य में जो भी आता वह मनवांछित फल पाता। जब वे ग्यारह वर्ष के हुए तो अपनी माता तखत बाई जी के साथ सेवकों के पास गए। भिन्न-भिन्न स्थानों से होते हुए वे बुच्चा गांव आ गए। गांववासी श्री सतगुरु देव जी तथा माता जी के दर्शन पाकर प्रसन्न हुए और उन्हें प्रणाम कर आदर सहित घर ले आए।

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9th Gurudev नवम् गुरुदेव
Shri Raam Pyara Sahib Ji श्री राम प्यारा साहिब जी

Satgurudev Shri Rampyara Sahib Ji was the Ninth Gurudev of the prestigious Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He was kind, generous and full of virtues. His persona was very simple. He used to recite Soham jaap day and night. The radiance on his face was as magnificent as that of the sun.

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10th Gurudev दशम् गुरुदेव
Shri Parasram Sahib Ji श्री परसराम साहिब जी

Satgurudev Shri Paras Ram Sahib Ji was the Tenth Gurudev of the divine Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He was a very simple man and always adorned a humble attire. He used to chant, meditate, follow continence and discuss the Brahm in the communion of saints. Keeping in mind the ‘Naam’ of Shri Harmilap Sahib Ji, he fulfilled the wishes of his devotees. Extremely fortunate Sundra Bai Ji was his virtuous wife, who loved him unconditionally.

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11th Gurudev एकादश् गुरुदेव
Muni Shri Harmilapi Ji श्री मुनि हरमिलापी जी महाराज जी

Satgurudev Shri Muni Harmilapi Ji Maharaj was the Eleventh Gurudev of the eminent Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji. He used to wear white and drape a yellow shawl. There was always a white towel on his shoulder and a walking stick in his hand. Wooden clogs adorned his feet. Brahma Ji had inscribed ‘Gol Chakras’ in his fingers and ‘Padma Rekha’ under his feet, which itself was a sign of divinity.

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12th Gurudev द्वादश् गुरुदेव
Shri Madan Mohan Ji श्री मदन मोहन हरमिलापी जी

Satgurudev Shri Madan Mohan Sahib Ji has adorned the renowned Gaddi of Shri Harmilap Sahib Ji as its Twelfth Gurudev. As beautiful is his name, so are his virtues. An illuminating aura surrounds him. One feels contentment in his holy presence. Gurudev is noble, philanthropic and full of spiritual beliefs.

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Guru Sahebaan
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